Purity always matters

As the stage gets Bigger, Sound gets Louder, Crowd gets larger. THE SHAKTI, quietly leaves

The Divine stays stable in purity, Purity of bhao being the most important.

The Divine stays stable where there is purity of Bhao

Sanatan Dharm Prarthna

In Sanatan Dharm we find a small yet powerful and important prarthna.

After completing darshans  we have a tradition of sitting in the mandir premises for few moments. These few moments are meant for saying a prarthna. As the divine darshan is fresh in our heart, don’t spend this time in worldly conversations.

The right prarthna to be done at that moment is:

After darshans at any mandir spend few moments in the outer parisar with a prarthna to the divine Shakti. 

“Annayaasaena Maranam, Bina Denyen Jeevanam,

Daehaantae tav Saanidhyam, Daehi me Parmeshwaram”. 

which simply means:

“I enter death without pain, This life should never need shelter, support nor dependancy on any other person ..

As I face death it should be in front of my Prabhu, And I leave this body with Your darshans,

.. Hey Parmeshwar please give me this vardan” 🙏

 

This is a ‘prarthna’, not ‘yachna’.

Yachna is a asking for material fulfilment; Prarthna, is a prayer for refuge with the Divine Shakti 🙇🏻‍🙇🏻‍

The right Sanatan Dharm prarthna to be done after darshans in any mandir

सनातन धर्म में एक छोटी किंतु महत्वपूर्ण प्रार्थना है। 

हमारी परंपरा अनुसार हम मंदिर से दर्शन करने के पश्चात कुछ पल मंदिर के आँगन में बैठते हैं। यह पल प्रार्थना करने के लिए होता है। 

हमारे मन में प्रभु दर्शन की छवि हो, तब दुनियादारी के बातों में ना पड़ कर यह प्रार्थना करें:

मंदिर में दर्शन के पश्चात्, आँगन में कुछ पल विश्राम करें, दिव्य शक्ति से प्रार्थना करें :

“अनायासेन मरणम् ,बिना देन्येन जीवनम्।

देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्।।”

which simply means

“बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो, किसी के आश्रय पर, सहारे पर निर्भर जीवन ना हो ..

मृत्यु हो, तो प्रभु के सम्मुख हो, प्रभु दर्शन करते हुए प्राण निकले ..

हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें दीजिए”🙏🙏

यह प्रार्थना है, याचना नहीं है । 

याचना, (माँग) सांसारिक वस्तु के लिए होती है ; प्रार्थना, प्रभु शरण के लिए विनती होती है 🙇🏻‍🙇🏻‍

जय श्री ठाकुरजी 

मंदिर से दर्शन करने के पश्चात कुछ पल मंदिर के आँगन में जब बैठते हैं, यह सनातन धर्म की प्रार्थना करनी चाहिए

The Fragrant Garden holiday

As I enter this holiday home the first thing to catch my attention is this huge ‘Madhu Malti-Bel’ which covers the back entrance of the house. It’s like a dream come true!

Fragrant Madhu Malti creeper which frames the back door

And as I discover in a walk around the lovely garden I realise it has all possible fragrant plants and trees around. OMG. This tall parijat😳 with the equally tall yellow desi SonChampa trees around it. The Ananta bush, the mogras, the Plumeria-Champa in every colour and variety! I discover that every corner has been filled with a fragrant bush. Bushes of Kamini fill the garden. Surely all year through must be filled with their seasonal aromas.

This MadhuMalti-bel is extraordinary! As it’s in full bloom.

The fragrance that it gives off fills all senses and I have to literally fight the urge to just laze under it all day till I drown in the natural aroma.
Lazing in the verandah has now become a habit

I find myself on this rocking chair every morning taking a nap besides this aromatic creeper, till I am woken up by the nudge of a nose from this Indibreed dog who claims ownership of this verandah. Which then reminds me of the takeaway sentence from this trip, courtesy Amisha my daughter;

“You have to learn to co exist, it is the natural way to live”!

Well I am trying this new life lesson and it does make a lot of sense: Even when I learnt that I was actually on the pot with a frog under me 😩

To take this photo I literally had to fight off few spiders 🕷 from the shoulders and brush off spider webs off my face.

As the sun rises and it’s rays hit the ground, this fragrance fills the surroundings. I have spent mornings and evenings, taking in this wonderful fragrance. It’s actually been a long standing desire to create this fragrant garden around me. Circumstances have not been conducive to it, I find myself living this dream here. The fulfilment of one more desire with kripa from my Thakurjee. (with help from my dear Tiki)

🙏🙏

Nothing is mine..Except my Karmas

The Eternal question

WHO AM I

अंधी दौड़

मैं कौन हूँ; मेरा यहाँ क्या है?

सोचने वाली बात है –

Who am I; What is mine 😱 Don’t we need to pause a bit and listen to our soul?

किस लिए, क्या पाना है?  कुछ देर विश्राम करें, सोचें,

हम भाग रहे हैं, अंतिम रेखा कहाँ है?

कठपुतलियों की तरह ता-थई कर रहे हैं, इस दुनिया के इशारों पर !

🙏

प्रभु का सत्य, खुद की सच्चाई,

वही खो देते हैं इस अंधी दौड़ में

Who Am I?

ShreeNathji Bhagwan’s Yatra..A poem

ShreeNathji

श्रीनाथजी की कृपा!

आँखों में अश्रु हैं..मन में आज प्रातःकाल से कुछ खलबली है!

कुछ भाव जो कविता के रूप में प्रस्तुत..
लम्बी हो गयी, पढ़ें ज़रूर 🙏

प्रभु श्रीनाथजी का प्राकट्य हुआ १४०९ 1409 गिरिराज कंदरा से-
५२३८ 5238 वर्ष बीतने पर, श्री राधाश्री कृष्ण एक बार फिर पधारे श्रीनाथजी स्वरूप में।

क़रीब २६० वर्ष गिरिराजजी पर व्रज वासीन से दिव्य लीला खेल करने के पश्चात,
१६६९ 1669 में श्रीनाथजी उठ चले प्रिय गिरिराज से,
एक भक्त को दिया वचन पूर्ण करने पहुँचे सिंहाड (नाथद्वारा) १६७२ 1672 में।

२ वर्ष, ४ महीने, ७ दिन वे रथ में चले,
इतना भाव था श्रीनाथजी का, अपनी भक्त और सखी अजबा के लिए;

जैसे श्री गुसाँई जी ने भविष्यवाणी करी थी, १६७२ में अटक गया (रुका) श्रीनाथजी का रथ मेवाड़ के एक पिपर के नीचे,
गंगाबाई से श्रीजी ने संदेश पहुँचाया;
“यह, मेरी प्रिय भक्त अजब की जगह है, बनाओ मेरी हवेली यहीं पर;
रहूँगा कई अरसे तक यहाँ,पूरा होगा मेरी प्रिय अजबा को दिया वचन,
तुम सब भी अवस्था अपनी करो यहीं अग़ल बग़ल।

हवेली बनी शानदार, एक दिव्य गोलोक ठाकुर बालक के लायक,
सभी व्यवस्था और सेवा, शुरू हुई, श्री गुसाँई जी के बताए अनुसार।

इतिहास बताता है, आख़िरी संवाद हुआ गंगा बाई के साथ।
शुशुप्त हो गयी शक्ति फिर-
बाहरी लीला खेल पृथ्वी वासी से शायद पूर्ण हो गए, प्रभु भी कुछ काल को भीतर समा गए।
सैकड़ों वर्ष यूँ ही बीते और एक बार फिर वक़्त आया दिव्य बालक श्रीनाथजी प्रभु के जागने का,
और गोलोक में मची हलचल;
भेजा अंश पृथ्वी लोक को इस आदेश के साथ, ‘जाओ लीला पूर्ण हो ऐसे करो श्रीजी की मदद’

अंश ख़ुद को पहचाने, फिर प्रभु को जागता है, ‘चलो ठाकुरजी समय आ गया, वापस हमें चलना है,
जल्दी जल्दी लीला पूर्ण कर लो, गोलोक को प्रस्थान करना है।

नन्हें से बालक हमारे प्यारे प्रभु श्रीजी जागे जो वर्षों से हो गए थे गुप्त!
“अरे, कहाँ गए मेरे नंद बाबा, यशोदा मैया, मुझे यहाँ छोड़ व्रज वासी सखा हो गए कहाँ लुप्त”?

अंश ने विनम्रता से समझाया, हाथ जोड़ प्रभु को याद दिलाया, ‘श्रीजी बाबा, समय आ गया गोलोक वापस पधारना है,
पृथ्वी के जो कार्य अधूरे हैं, पूर्ण कर वापस हमें चले जाना है’।

किंतु, नन्हें ठाकुरजी बाहर आकर रह गए आश्चर्य चकित;
” मेरी हवेली इतनी शानदार होती थी, ये क्या हुआ,
इतनी टूटी फूटी कैसे हो गयी, कितना अपवित्र वातावरण है!
और यह कौन पृथ्वी वासी हैं जो मेरे उपर दुकानें लगा कर बैठे हैं,
क्या लोग भूल गए अंदर किसका वास है”

श्रीनाथजी प्रभु को समझने में कुछ वक़्त लग गया,
और अंश को बताना ही पड़ा,
‘प्रभु कुछ भाव में कमी आ गयी है, इन्हें माफ़ कर दीजिए,
सूझ बूझ हर इंसान की लालच के कारण कम हो गयी है,
उन्हें उनके कर्मों पर छोड़ दीजिए;
हमें कई कार्य पूरे करने हैं उसमें आप हमारा मार्गदर्शन कीजिए’.

‘गिरिराज गोवर्धन कर रहा है आपका इंतज़ार,
लीला के शुशुप्त अंश सर झुकाए आपके दर्शन को तरस रहे हैं इतने साल;
श्रीजी, शुरू करो प्रस्थान,
ऐसा हमें तरीक़ा सुझाएँ किसी का ना हो नुक़सान’;

श्रीजी पहुँचे गिरिराज जी पर,
किंतु यह क्या!
“यहाँ भी यही हालात हैं, गोवर्धन को भी नहीं छोड़ा
इन पृथ्वी वासी ने मेरे गिरिराज को भी क़ब्ज़ा कर इतना अपवित्र कर दिया;
चलो, मेरे गोलोक अंश चलो, मैं तुम्हें बताता हूँ,
मुझे भी अब जल्द से जल्द पृथ्वी से प्रस्थान करना है,
व्रज वासी हो, या फिर नाथद्वारा वासी;
लालच ने आँख पे पर्दा डाल दिया है,
जब पवित्रता ही नहीं भाव में, यहाँ अब मेरी ज़रूरत नहीं;
इन्हें रुपया बटोरने दो; मुझे यहाँ से मुक्त कर मेरे गोलोक वापस ले चलो”।

🙏 आभा शाहरा श्यामा
श्रीजी प्रभु की सेवा में, हमेशा

श्रीनाथजी को ६११ (611) वर्ष बीत गए,
श्रीनाथजी बाबा हम पृथ्वी वासी पर कृपा करे हुए हैं!

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Hindu Bhojan mantr-Prarthna before meals

HINDU BHOJAN MANTR (prarthna before partaking of meals)

ॐ ब्रहमार्पणं ब्रहमहविर्; ‌ब्रहमाग्नौ ब्रहमणा हुतम् ।

ब्रहमैव तेन गन्तव्यं ; ब्रहमकर्मसमाधिना ॥

Brahmarpanam brahm havih – r- brahma maagrau brahmana hutam

Brahmaiv ten gantavyam brahm-karm-samadhinaa

ॐ सह नाववतु ।सह नौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै ।

तेजस्विनावधीतमस्तु ।मा विद्‌विषावहै ॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:

Om Saha Naav[au]-Avatu

Saha Nau Bhunaktu

Saha Viiryam Karavaavahai

Tejasvi Naav[au]-Adhiitam-Astu Maa

Om shantih shantih shantih

(The above Shlok is from the Bhagavad-Gita {chapter4 shlok 24} which is also chanted together as Bhojan Mantr)

जैसा अन्न ग्रहण करते हैं, वैसा मन और विचार होते हैं।

यह भी मानते हैं की सोच विचार कर किसी के घर का भोजन करना चाहिए।

भोजन करते समय भोजन का निरादर नहीं करना चाहिए, चाहे जैसा भी हो।

पूर्ण कृतज्ञता के साथ भोजन करना है।

The act of eating is considered to be a sacred time (ie if we regulate our meals and not eat all through the day)

As per Hindu scriptures a meal should begin with the appropriate bhojan prarthna; a prarthna of offering food to the Brahm within us all. A prarthna of gratitude and peace. So that the bhojan taken gives us good positive energy and peace.

A simple thought of being grateful for the food that is before you is powerful enough to turn it into positive energy.

Take only as much as you are going to eat. Wastage of ann (food) is being disrespectful of the food you receive.

(All details are from appropriate sites on internet)

Below is the Utube link which gives this mantra with perfect words for correct pronunciation.

(I use it regularly)

https://www.youtube.com/watch?v=hieAnFemIZQ&feature=share

U Tube upload Piyush Rathore

Thank you 🙏

To succeed in your spiritual goals..

To those who wish to reach higher in their spiritual aspirations

Swami Vivekanand says,

“Take up one idea. Make that one idea your life-think of it, dream of it, live on that idea.

The first step is not to disturb the mind, not to associate with persons whose ideas are disturbing. Avoid them. And those of you who want to go to the highest, must avoid all company, good or bad. Practise hard; whether you love or die does not matter.

Those who take up just a bit of it and a little of everything else make no progress. It is of no use simply to take up a course of lessons.

To those who are full of Tamas, ignorant and dull-those whose minds never get fixed on any idea, who only crave for something to amuse them, religion and philosophy are simply objects of entertainment. These are the unpersevering. They hear a talk, think it very nice and then go home and forget all about it.

To succeed you must have tremendous perseverance, tremendous will.

“I will drink the ocean, at my will the mountains will crumble”, says the preserving soul.

Have that sort of energy, that sort of will, work hard and you will reach the goal”.

Where has My Mumbai disappeared

In this concrete jungle I search for my Mumbai

In this concrete jungle I search for that rainbow which was my Mumbai ;

Every time I am sad and depressed about the downfall of my city I make a plan on moving out; But how do I do this; I am Mumbai and Mumbai is me..

Where else will I feel at home?

Though my city has become a hole I continue to live here as leaving this home would mean leaving my entire life and memories behind .. I am addicted

In this concrete jungle I search for my Mumbai

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MUMBAI .. the city that once was the pride of our nation is now just a shadow which waits for death as the darkness engulfs .. what have we done to the once beautiful and green city. It took just 25/30 years to destroy that which was looked upon as a dream city

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Mumbai has become a nightmare. Having spent 54 out of my 62 years in this city I see and watch with despair the deterioration in every aspect of living..

too many people jammed in the kilometre.

Quality of air, water, food is at an ultimate low

Roads are a nightmare .. again too many cars.. too many two wheelers .. too many people jay walking

Footpaths taken over by the hawkers..roads encroached with parking cars or buses or tempos

Construction material lying around after completion of a job

No one, absolutely no one to safe guard the citizens rights; they who pay all taxes on time, and maintain every aspect of civic sense

The elected government just does not care.. the #BMC has been super negligent in their jobs

#shivsena who make several promises overlook and forget once elected in power

No parks left to have a quiet walk .. what happened?

My childhood was spent literally walking to school through green fields .. Drinking water directly from the municipal taps at school and in gardens was the done thing

TOO MUCH ILLEGAL CONSTRUCTION.. too much migration of people looking for livelihoods.. development of illegal slums .. the list of destructions is endless 😠

Mumbai is the planets second most densely populated city with 31,700 people per square kilometre, as per UN habitat data