Surrender

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

श्री कृष्ण चरणों में समर्पित यह जीवन यात्रा,

श्रीनाथजी ठाकुरजी की कृपा पात्र;

यहीं है आख़िरी मंज़िल इस जीव आत्म की; कहीं और भटकने की ज़रूरत अब नहीं

जय श्री राधे कृष्ण 🙏

जहाँ श्री राधा कृष्ण लीला में डूब जाने को मन, शरीर, आत्मा और दिल करे, वो व्रज धाम, श्रीनाथजी ठाकुरजी की प्रिय लीला भूमि;

The 84 Kos of Divine Land which Appeared on Earth from Golok, at the request of Shree Radha, is where this soul will find the final rest;

the merging with the Presence of Thakurjee ShreeNathji; who permanantly resides on sacred Shri Govardhan, with Shree RadhaKrishn and all His Sevaks and Gwal Bals

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

श्रीनाथजी के साक्षात्कार जून २००५ में, उनके मुखारविंद, श्री गोवर्धन

वह भव्य, दिव्य व्रज भूमि, जो साक्षात गोलोक है, नेत्र और आत्म में शुद्धता होने से आलोकिकता महसूस होने लगे, तो समझिए श्रीजी की कृपा बरस रही है 🙏

श्री राधा, श्री कृष्ण-दिव्य प्रेम के पूर्ण प्रतीक इस पृथ्वी पर हमें एहसास दिलाते हैं, जागो और मुझ में समा जाओ, श्रीनाथजी ठाकुरजी जिनके संविलीन स्वरूप आज हमारे बीच हैं 🙏

An original Varta about ShreeNathji Prabhu – ‘Toad ka ghana’ (forest)

टोड के घने-श्रीनाथजी वार्ता
An original varta about ShreeNathji Prabhu – Toad ka ghana (forest)

संवत १५५२ श्रावण सुद तेरस बुधवार के दिन श्रीनाथजी टोड के घने पधारे थे:

कुंभनदासजी श्रीनाथजी की सेवा में नित्य कीर्तन करके श्रीनाथजी को रिझाते थे।श्रीनाथजी उनको अपना सानुभव जताते थे। वे साथ साथ खेलते रहते थे और बाते भी किया करते थे.
वार्ता :
थोड़े ही दिनोंमें एक यवन(Mughal kings)का उपद्रव इस विस्तारमें शुरू हुआ। वह सभी गांवोंको लूटमार करके पश्चिमसे आया। उसका पड़ाव श्री गिरिराजजीसे लगभग सात किलोमीटर दूर पड़ा था।
सदु पांडे, माणिकचंद पांडे, रामदासजी और कुंभनदासजी चारों ने विचार किया की यह यवन बहुत दुष्ट है और भगवद धर्म का द्वेषी है। अब हमें क्या करना चाहिये ?
यह चारों वैष्णव श्रीनाथजीके अंतरंग थे।
उनके साथ श्रीनाथजी बाते किया करते थे। उन्होंने मंदिरमें जाकर श्रीनाथजी को पूछा कि महाराज अब हम क्या करें ? धर्म का द्वेषी यवन लूटता चला आ रहा है। अब आप जो आज्ञा करें हम वैसा करेंगें।

श्रीनाथजीने आज्ञा करी कि हमें टोंड के घने में पधारने की इच्छा है वहां हमें ले चलो। तब उन्होंने पूछा कि महाराज इस समय कौन सी सवारी पर चले? तब श्रीनाथजी ने आज्ञा करी, “सदु पांडे के घर जो पाडा है उसे ले आओ। मैं उसके ऊपर चढ़कर चलुंगा”।
सदु पाण्डे उस पाड़ा को लेकर आये. श्रीनाथजी उस पाड़ा पर चढ़कर पधारें। श्रीनाथजी को एक तरफ से रामदासजी थांभ कर चल रहे थे और दूसरी तरफ सदु पांडे थांभ कर चल रहे थे.
कुंभनदास और माणिकचंद वे दोऊ आगे चलकर मार्ग बताते रहते थे।

टोंड के घने में एक चौतरा है और छोटा सा तालाब भी है। एक वर्तुलाकार चौक के पास आके रामदासजी और कुंभनदासजी ने श्रीनाथजी को पूछा, “आप कहाँ बिराजेंगे”?
तब श्रीनाथजीने आज्ञा करी कि हम चौतरे पर बिराजेंगे। श्रीनाथजी को पाड़े पर बिठाते समय जो गादी बिछायी थी उसी गादी को इस चौतरे पर बिछा दी गई और श्रीनाथजी को उस पर पधराये.

चतुरा नागा नाम के एक विरक्त भगवद भक्त थे वे टोड के घने में तपस्या किया करता थे। वे गिरिराजजी पर कभी अपना पैर तक नहीं रखते थे।
मानों उस चतुरा नागा को ही दर्शन देनेके लिए ही श्रीनाथजी पाडा पर चढ़कर टोंड की इस झाड़ी में पधारें,
चतुरा नागा ने श्रीनाथजी के दर्शन करके बड़ा उत्सव मनाया। बन मे से किंकोडा चुटकर इसकी सब्जी और आटे का हलवा (सीरा) बनाकर श्रीनाथजी को भोग समर्पित किया।

दूसरी वार्ता:
इसके बारे में दूसरा उल्लेख यह भी है कि श्रीनाथजी ने रामदासजीको आज्ञा करी कि तुम भोग धरकर दूर खड़े रहो।
तब श्री रामदासजी और कुंभनदासजी सोचने लगे कि किसी व्रज भक्त तके मनोरथ पूर्ण करने हेतु यह लीला हो रही है।
रामदासजी ने थोड़ी सामग्री का भोग लगाया तब श्रीनाथजी ने कहा कि सभी सामग्री धर दो।
श्री रामदासजी दो सेर आटा का सीरा बनाकर लाये थे उन्होंने भोग धर दिया।
रामदासजी ने जताया कि अब हम इधर ठहरेंगें तो क्या करेंगें ? तो श्रीनाथजी ने कहा कि तुमको यहाँ रहना नहीं है।
कुम्भनदास, सदु पांडे, माणिक पांडे और रामदासजी ये चारों जन झाड़ी की ओट के पास बैठे।
तब निकुंजके भीतर श्री स्वामिनीजीने अपने हाथोंसे मनोरथ की सामग्री बनाकर श्रीनाथजी के पास पधारे और भोग धरे।
श्रीनाथजी ने अपने मुख से कुंभनदासको आज्ञा करी,“कुंभनदास इस समय ऐसा कोई कीर्तन गा तो मेरा मन प्रसन्न होने पावे। मै सामग्री आरोंगु और तु कीर्तन गा”।
श्री कुम्भनदासने अपने मनमें सोचा कि प्रभुको कोई हास्य प्रसंग सुननेकी इच्छा है ऐसा लगता है।
कुंभनदास आदि चारों वैष्णव भूखे भी थे और कांटें भी बहुत लगे थे इस लिये कुंभनदासने यह पद गाया :
राग : सारंग
“भावत है तोहि टॉडको घनो ।
कांटा लगे गोखरू टूटे फाट्यो है सब तन्यो ।।१।।
सिंह कहां लोकड़ा को डर यह कहा बानक बन्यो ।
‘कुम्भनदास’ तुम गोवर्धनधर वह कौन रांड ढेडनीको जन्यो ।।२।।

यह पद सुनकर श्रीनाथजी एवं श्री स्वामिनीजी अति प्रसन्न हुए। सभी वैष्णव भी प्रसन्न हुए।

बादमें मालाके समय कुंभनदासजीने यह पद गाया :
बोलत श्याम मनोहर बैठे…
राग : मालकौंश
बोलत श्याम मनोहर बैठे, कमलखंड और कदम्बकी छैयां
कुसुमनि द्रुम अलि पीक गूंजत, कोकिला कल गावत तहियाँ ।। 1 ।।

सूनत दूतिका के बचन माधुरी, भयो हुलास तन मन महियाँ ।
कुंभनदास ब्रज जुवति मिलन चलि, रसिक कुंवर गिरिधर पहियाँ ।। 2 ।।

यह पद सुनकर श्रीनाथजी स्वयं अति प्रसन्न हुए। बादमें श्री स्वामिनीजी ने श्रीनाथजी को पूछा, “आप यहाँ किस प्रकार से पधारें”? श्रीनाथजी ने कहा, “हम सदु पांडेके घर जो पाड़ा था उस पर चढ़कर हम पधारे हैं”।
श्रीनाथजी के इस वचन सुनकर स्वामिनीजीने उस पाड़ा की ओर दृष्टि करके कृपा करके बोलीं, “कि यह तो हमारे बाग़ की मालन है। वह हमारी अवज्ञा से पाड़ा बनी है पर आज आपकी सेवा करके उसके अपराध की निवृत्ति हो गई”।

इसी तरह नाना प्रकारे केली करके टोड के घने से श्री स्वामिनी जी बरसाना पधारें।
बादमें श्रीनाथजी ने सभी को जो झाड़ी की ओट के पास बैठे थे उनको बुलाया और सदु पांडे को आज्ञा करी कि अब जा कर देखो कि उपद्रव कम हुआ ?
सदु पांडे टोड के घनेसे बाहर आये इतने मे ही समाचार आये कि यवन की फ़ौज तो वापिस चली गई है। यह समाचार सदु पांडे ने श्रीनाथजी को सुनाया और बिनती की कि यवन की फ़ौज तो भाग गई है तब श्रीनाथजी ने कहा कि अब हमें गिरिराज पर मंदिरमें पधरायें।

इसी प्रकारे आज्ञा होते ही श्रीनाथजी को पाड़े पर बैठा के श्री गिरिराज पर्वत पर मंदिर में पधराये।
यह पाड़ा गिरिराज पर्वत से उतर कर देह छोड़कर पुन: लीलाको प्राप्त हुआ।
सभी ब्रजवासी मंदिरमें श्रीनाथजीके दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुए और बोले की धन्य है देवदमन ! जिनके प्रतापसे यह उपद्रव मिट गया।

इस तरह संवत १५५२ श्रावण सुदी तेरस को बुधवार के दिन चतुरा नागाका मनोरथ सिद्ध करके पुन: श्रीनाथजी गिरिराजजी पर पधारें।

यह पाड़ा अनंत लीला में कौन था:
यह पाड़ा दैवी जीव था। लीला में वो श्री वृषभानजी के बगीचा की मालन थी। लीला में उसका नाम वृंदा है।
नित्य फूलोंकी माला बनाकर श्री वृषभानजी के घर लाती थी।
एक दिन श्री स्वामिनीजी बगीचा में पधारें तब वृंदा के पास एक बेटी थी उसको वे खिलाती रही थी। उसने न तो उठकर स्वामिनी जी को दंडवत किये कि न तो कोई समाधान किया।
फिर भी स्वामिनीजी ने उसको कुछ नहीं कहा। उसके बाद श्री स्वामिनीजी ने आज्ञा की के तुम श्री नंदरायजी के घर जाकर श्री ठाकोरजीको संकेत करके हमारे यहां पधारने के लिए कहो; तो वृंदा ने कहा की अभी मुझे मालाजी सिद्ध करके श्री वृषभानजी को भेजनी है तो मैं नहीं जाऊँगी.
ऐसा सुनकर श्री स्वामिनीजीने कहा, “मैं जब आई तब उठकर सन्मान भी न किया और एक काम करने को कहा वो भी नहीं किया। इस प्रकार तुम यह बगीचा के लायक नहीं हो। तू यहाँ से भुतल पर पड़ और पाडा बन जा”।

इसी प्रकार का श्राप उसको दिया तब वह मालन श्री स्वामिनीजी के चरणारविन्दमें जा कर गिर पडी और बहुत स्तुति करने लगी और कहा कि आप मेरे पर कृपा करों जिससे मैं यहां फिर आ सकुं।
तब स्वामिनीजी ने कृपा करके कहा की जब तेरे पर चढ़कर श्री ठाकुरजी बन में पधारेंगें तभी तेरा अंगीकार होगा।
इसी प्रकार वह मालन सदु पांडे के घर में पाड़ा हुई और जब श्रीनाथजी उस पर बेठ कर वन में पधारे तब वो पुन: लीलाको प्राप्त हुई.

जय श्रीनाथजी ठाकुरजी 🙏
जय श्री राधे कृष्ण 🙏

Points for this varta taken from this site:

https://www.facebook.com/mohanjigokul/

यह टोंड के घनेमें श्रीनाथजी की बैठक है जहाँ सुंदर मंदिर व बैठकजी बनाई गई है।

 

 

 

Jai ShreeNathji

Jai Shree RadhaKrishn

 

 

 

 

 

 

 

Shri Vallabh Acharya 22nd Baithakji at Maan Sarovar- Vraj

Shri Vallabh Acharya 22nd Baithakji at Maan Sarovar, Mathura

Here are some pictures displayed from my visit to the 22nd Baithak of Mahaprabhuji, located at Maan Sarovar,opposite Yamunaji, Maant, Mathura, Vraj Mandal.

Baithakji Charitr: (बैठकजी चरित्र)

Shri Mahaprabhu Vallabhachayra stayed for three days at Maan Sarovar discussing the Shrimad Bhagavat.

Once, Damala awoke in the middle of the night and noticed that his guru was missing.

A few hours later, Shree Krishn appeared before Damala who exclaimed, “Today I am certainly blessed to have your supreme vision. “

Shree Krishn than told Damala, “Today, Shrew Radha has become very displeased with me.”

Later, Shree Radha came to meet Thakurjee and Their reuinon was re established.

Damala and Shri Mahaprabhuji had the sight of this divine pastime. All of this transpired while the other Vaishnavas were deep in sleep.

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

What are Pushtimarg Baithaks?

Baithaks in Pushtimarg religion are pavitr places where Shri Vallabhachary, the founder of Pushtimarg, narrated the Pavitr Bhagvad Katha. They are total 84 in number and spread all over the country.

Mahaprabhuji had circled the whole of India three times and done sthapna of these various Baithaks.

Each Baithak has its own particular Charitr (description).

Baithaks are holy places where there is no Idol or Chitr (Picture); seva is done of Gaddi (Seating).

Save Vrindavan

SAVE VRINDAVAN FROM THE GREED OF HUMANS:

Special strong laws is need of the hour. Already this sacred city has reached the point of no return. Few years more down the line and we will have a concrete jungle and heaps of waste littering all the divine vans. Yamunaji has already shrunk to the point of not being there.

#CMYogiAditynath #vrindavan

#CMYogiAditynath Stop trying to see #Vrindavan riding on your special #helicopters 🚁 and getting special darshans

#नरेंद्रमोदी #वृंदावन #मथुरा #Pmoindia

आज ७ जुलाई २०१९, वृंदावन में सूचना मिली की #CMYogiAditynath वृंदावन में पधार रहे हैं।

मीटिंग है और बाँके बिहारी जी के दर्शन के लिए जाएँगे।

सम्पूर्ण city को बंद कर दिया! रिक्शॉ तक को अंदर घूमने की अनुमति नहीं है। कई घंटों तक सब रोड बंद रहेंगे।

#CMYogiAditynath अगर आप VIP roads से आएँगे जाएँगे, शहर आपके लिए ख़ाली कर दिया जाएगा, आपको कैसे अन्दाज़ होगा की समस्या क्या हैं?

सुधार कैसे करेंगे?

फ़ालतू के projects पर budget ख़र्च करके आप समझते हैं आपकी duty पूरी हो गई?

शहर और तीर्थ की जो असल समस्या है, वहीं की वहीं रह जाती हैं।

क्या आपने कभी सोचा है की आप आपके VIP troup के साथ निकल जाते हैं, किंतु आप अभी नहीं जान पाते हैं, सत्य क्या है?

आज किन हालात में है यह पवित्र भूमि, जो श्री राधा कृष्ण का निवास है, जहाँ हर क़दम पर कोई लीला भूमि है?

वृंदावन आज इतने बुरे आक्रमण से जूझ रहा है, आप को कैसे पता चलेगा, आप कभी समझ ही नहीं सकते!

आक्रमण लालच में अंधे इंसान का है, जो इस पवित्र भूमि को लूटने पर तुले हैं।

#CMYogi

Please come down to the level of the common bhakt and try to see what is ailing my #Vrindavan.

Stop trying to see Vrindavan riding on your special #helicopters 🚁

Walk on the streets to know how you can truly help this dying #teerth

श्रीनाथजी #ठाकुरजी प्रभु आपको सद् बुद्धि देने की कृपा करें 🙏

ShreeNathji-Kesar Snan

Kesar Snan at ShreeNathji mandir-ज्येष्ठाभिषेक (स्नान-यात्रा)

ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा

Monday, 17 June 2019

आज ज्येष्ठाभिषेक है जिसे केसर स्नान अथवा स्नान-यात्रा भी कहा जाता है.

Shreenathjibhakti.org

Kesar Snan@ShreeNathji

श्री नंदरायजी ने श्री ठाकुरजी का राज्याभिषेक कर उनको व्रज राजकुंवर से व्रजराज के पद पर आसीन किया, यह उसका उत्सव है.

आज के दिन ही ज्येष्ठाभिषेक स्नान का भाव एवं सवालक्ष आम अरोगाये जाने का भाव ये हे की यह स्नान ज्येष्ठ मास में चन्द्र राशि के ज्येष्ठा नक्षत्र में होता है और सामान्यतया ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को होता है.

इसी भाव से स्नान-अभिषेक के समय वेदमन्त्रों-पुरुषसूक्त का वाचन किया जाता है. वेदोक्त उत्सव होने के कारण सर्वप्रथम शंख से स्नान कराया जाता है.

ऐसा भी कहा जाता है कि व्रज में ज्येष्ठ मास में पूरे माह श्री यमुनाजी के पद, गुणगान, जल-विहार के मनोरथ आदि हुए. इसके उद्यापन स्वरुप आज प्रभु को सवालक्ष आम अरोगा कर पूर्णता की.

श्रीजी प्रभु वर्ष में विविध दिनों में चारों धाम के चारों स्वरूपों का आनंद प्रदान करते हैं.

आज ज्येष्ठाभिषेक स्नान में प्रभु श्रीजी दक्षिण के धाम रामेश्वरम (शिव स्वरूप) के भावरूप में वैष्णवों को दर्शन देते हैं जिसमें प्रभु के जूड़े (जटा) का दर्शन होता है

इसी प्रकार आगामी रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रभु भक्तों पर आनंद वर्षा करेंगे.

आज कैसे सेवा की जाती है :

पर्व रुपी उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

झारीजी में सभी समय यमुनाजल भरा जाता है. चारों समय (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) की आरती थाली में की जाती है.

गेंद, दिवाला, चौगान आदि सभी चांदी के आते हैं.

आज मंगला दर्शन में श्रीजी को प्रतिदिन की भांति श्वेत आड़बंद धराया जाता है.

मंगला आरती के उपरांत खुले दर्शनों में ही टेरा ले लिया जाता है और अनोसर के सभी आभरण व प्रभु का आड़बंद बड़ा (हटा) कर केशर की किनारी से सुसज्जित श्वेत धोती, गाती का पटका एवं स्वर्ण के सात आभरण धराये जाते हैं.

इस उपरांत टेरा हटा लिया जाता है और प्रभु का ज्येष्ठाभिषेक प्रारंभ हो जाता है.

सर्वप्रथम ठाकुरजी को कुंकुम से तिलक व अक्षत किया जाता है. तुलसी समर्पित की जाती है.

तिलकायत जी अथवा उपस्थित गौस्वामी बालक स्नान का संकल्प लेते हैं और रजत चौकी पर चढ़कर मंत्रोच्चार, शंखनाद, झालर, घंटा आदि की मधुर ध्वनि के मध्य पिछली रात्रि के अधिवासित केशर-बरास युक्त जल से प्रभु का अभिषेक करते हैं.

सर्वप्रथम शंख से ठाकुरजी को स्नान कराया जाता है और इस दौरान पुरुषसूक्त गाये जाते हैं. पुरुषसूक्त पाठ पूर्ण होने पर स्वर्ण कलश में जल भरकर 108 बार प्रभु को स्नान कराया जाता है. इस अवधि में ज्येष्ठाभिषेक स्नान के कीर्तन गाये जाते हैं.

स्नान का कीर्तन – (राग-बिलावल)

मंगल ज्येष्ठ जेष्ठा पून्यो करत स्नान गोवर्धनधारी l

दधि और दूब मधु ले सखीरी केसरघट जल डारत प्यारी ll 1 ll

चोवा चन्दन मृगमद सौरभ सरस सुगंध कपूरन न्यारी l

अरगजा अंग अंग प्रतिलेपन कालिंदी मध्य केलि विहारी ll 2 ll

सखियन यूथयूथ मिलि छिरकत गावत तान तरंगन भारी l

केशो किशोर सकल सुखदाता श्रीवल्लभनंदनकी बलिहारी ll 3 ll

स्नान में लगभग आधा घंटे का समय लगता है और लगभग डेढ़ से दो घंटे तक दर्शन खुले रहते हैं.

दर्शन पश्चात श्रीजी मंदिर के पातलघर की पोली पर कोठरी वाले के द्वारा वैष्णवों को स्नान का जल वितरित किया जाता है.

मंगला दर्शन उपरांत श्रीजी को श्वेत मलमल का केशर के छापा वाला पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर सफ़ेद कुल्हे के ऊपर तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धराये जाते हैं.

मंगला दर्शन के पश्चात मणिकोठा और डोल तिबारी को जल से खासा कर वहां आम के भोग रखे जाते हैं. इस कारण आज श्रृंगार व ग्वाल के दर्शन बाहर नहीं खोले जाते.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में आज श्रीजी को विशेष रूप से मेवाबाटी व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.

सखड़ी में घोला हुआ सतुवा, श्रीखण्ड भात, दहीभात, मीठी सेव, केशरयुक्त पेठा व खरबूजा की कढ़ी अरोगाये जाते हैं.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) में ही उत्सव भोग भी रखे जाते हैं जिसमें खरबूजा के बीज और चिरोंजी के लड्डू, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी, बासोंदी, जीरा मिश्रित दही, केसरी-सफेद मावे की गुंजिया, घी में तला हुआ चालनी का सूखा मेवा, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा, विविध प्रकार के फलफूल, शीतल के दो हांडा, चार थाल अंकुरी (अंकुरित मूंग) आदि अरोगाये जाते हैं.

इसके अतिरिक्त आज ठाकुरजी को अंकूरी (अंकुरित मूंग) एवं फल में आम, जामुन का भोग अरोगाने का विशेष महत्व है.

मैंने पूर्व में भी बताया था कि अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक प्रतिदिन संध्या-आरती में प्रभु को बारी-बारी से जल में भीगी (अजवायन युक्त) चने की दाल, भीगी मूँग दाल व तीसरे दिन अंकुरित मूँग (अंकूरी) अरोगाये जाते हैं.

इस श्रृंखला में आज विशेष रूप से ठाकुरजी को छुकमां मूँग (घी में पके हुए व नमक आदि मसाले से युक्त) अरोगाये जाते हैं.

(Details taken fromhttps:m.facebook.com/Shreenathjiprasad/)

राजभोग दर्शन का विस्तार

कीर्तन – (राग : सारंग)

जमुनाजल गिरिधर करत विहार ।

आसपास युवति मिल छिरकत कमलमुख चार ॥ 1 ll

काहुके कंचुकी बंद टूटे काहुके टूटे ऊर हार ।

काहुके वसन पलट मन मोहन काहु अंग न संभार ll 2 ll

काहुकी खुभी काहुकी नकवेसर काहुके बिथुरे वार ।

‘सूरदास’ प्रभु कहां लो वरनौ लीला अगम अपार ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत मलमल की पिछवाई धरायी जाती है जिसमें केशर के छापा व केशर की किनार की गयी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को श्वेत मलमल का केशर के छापा वाला पिछोड़ा धराया जाता है.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) उष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है.

हीरा एवं मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर श्वेत रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, तीन मोरपंख की चंद्रिका की जोड़ तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.

श्रीकंठ में बघ्घी धरायी जाती है व हांस, त्रवल नहीं धराये जाते. कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. तुलसी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.

श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, मोती के वेणुजी तथा दो वेत्रजी धराये जाते हैं.

पट ऊष्णकाल का व गोटी मोती की आती है.

आरसी श्रृंगार में हरे मख़मल की एवं राजभोग में सोने की डांडी की आती है.

जय श्रीनाथजी प्रभु

ठाकुरजी श्री राधा कृष्ण की जय हो

🙏

Shreenathjibhakti.org

Kesar snan at ShreeNathji mandir

Shreenathjibhakti-Kesar snan at ShreeNathji mandir

Seva Kunj at Vrindavan

Seva Kunj also known as Nikunj Van is a van (forest); it has a mandir for Shree RadhaKrishn.

 

Abha Shahra

Seva Kunj-Serene, Sacred, Silent, Divine

श्री सेवा कुंज निकुंज वन के नाम से भी जाना जाता है, जो वृंदावन धाम में परिक्रमा मार्ग पर स्थित है।

It is believed that Shree RadhaKrishn visit here every night.

The nij mandir is decorated for Them and all necessary items placed here for the night. This small mandir is decorated with all leelas painted on the walls which is very pretty.

 

For a complete gallery please click the link below:

https://wordpress.com/view/sewakunj.wordpress.com

The video of this divine place can be viewed here:

Jai Shree radhaKrishn

Jai ShreeNathji

Jai Vraj Mandal

ShreeNathji mandir on Giriraj Govardhan

ShreeNathji Mandir darshan on Shri Giriraj Govardhan parvat

श्रीनाथजी प्रभु का प्राचीन मंदिर, गिरिराज गोवर्धन पर।महिमा सुनिए, दिव्य दर्शन कीजिए

इस दुर्लभ विडीओ में देखिए मंदिर के वे दर्शन:

⁃ उस खिड़की का दर्शन कीजिए जहाँ से श्री ठाकुरजी श्री गुसाँई जी को दर्शन देते थे, अपने मंदिर से चंद्र सरोवर पर जब श्री गुसाँई जी ने ६ महीने विप्रयोग का अनुभव करा; उनकी बैठकजी है यहाँ पर

⁃ उस खिड़की का जहाँ श्रीनाथजी मोहना भंगी को दर्शन देते थे

⁃ उस खिड़की का जहाँ से श्रीनाथजी व्रज वासी को दर्शन देते थे बिलछु कुंड पर; और बिलछु कुंड पर अपनी ही युगल स्वरूप लीला का अनुभव करते थे

⁃ शैया मंदिर में श्री महा प्रभुजी की १५वीं बैठकजी के दर्शन कीजिए

⁃ उस शैया मंदिर का दर्शन कीजिए जहाँ श्री महाप्रभुजी श्री नवनीत प्रियाजी के साथ शयन करते हैं

⁃ दर्शन कीजिए वह सुरंग का जो सीधी नाथद्वारा जाती है, जहाँ से कहते हैं श्रीनाथजी नाथद्वारा से श्री गोवर्धन आते जाते थे

🙏

जय श्रीनाथजी प्रभु

Shri Vallabh Aachary 24th Baithakji at Shri Chitrakut

ShreeNathji-MahaPrabhuji 24th Baithakji at Chitrakut, Madhya Pradesh

Here are some pictures displayed from my visit to the 24th Baithak of Mahaprabhuji, located at Chitrakut on Shri Kantanath Parvat (श्री कान्तानाथ पर्वत,सतना), Satna, Madhya Pradesh.

Baithakji Charitr: (बैठकजी चरित्र)

On Shri Kantanath Parvat, Mahaprabhuji Vallabh Achary narrated Shrimad Bhagavad Puran(श्रीमद् भागवद पुराण). He also narrated the pavitr Ramayan Granth (रामायण पाठ); explaining the legends of Shree Ram and Sita mata.

Shree Hunumanji, daily came and stood on one foot when hearing the pavitr varta.

Though Mahaprabhuji requested Him to take his seat, Hanumanji refused saying that he had taken a sankalp.

Mahaprabhu Vallabhachary later explained that Shri Kantanath parvat is the brother of Shri Giriraj Parvat, therefore we should not walk on the sacred mountain.

Shri Kantanath parvat, wished that Mahaprabhuji bless him with the touch of his feet; so came disguised as a Brahman saying, “Shree Sita and Shree Ram have told me to tell you that They are on top of Shri Kantanath parvat and are very hungry so please bring them some food.”

Shri Mahaprabhuji then requested Damala to prepare bananas with sugar, cardaman, and rose water. At this Krishndas questioned, “How is it possible to offer the foodstuff to Shree Krishn and alsoto Shree Ram?” Shri Mahaprabhuji replied, “Shree Ram is no other than Shree Krishn, the only difference being that Shree Ram is controlled by law while Shree Krishn is governed by grace.”

Shri Mahaprabhu ji then went up on the parvat and saw Shree Sita and Shree Ram sitting with Laxshman by their side holding an umbrella. Hanumanji stood by with folded hands.

Shree Ram, taking Shri Mahaprabhuji’s hand made him sit next to him on his jewelled throne. After Shree Ram and Shree Sita partook of the bananas, Laxshman ji and Hamunan ji took the remains.

For some time Shree Ram and Mahaprabhuji became engrossed in divine discourse.

Shree Ram then said, “It was my great desire to partake food offered by your hand. Mahaprabhuji then took his leave and climbed down of Shri Kantanath parvat.

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

The Mukhiyaji at present:

Rehi Ganeshji Sharma

Shrimad Vallabhachary Mahaprabhuji 24th Baithakji, Kaamta, Chitrakut Dham

Post Peelee Kothi, Jila-Satna (MP) Pin 485334.

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ShreeNathji-MahaPrabhuji 24th Baithakji at Chitrakut, Madhya Pradesh

Mahaprabhu Vallabhachary later explained that Shri Kantanath parvat is the brother of Shri Giriraj Parvat, therefore we should not walk on the sacred mountain. Shri Kantanath parvat, wished Mahaprabhuji to bless him with the touch of his feet; so came disguised as a Brahman saying, “Shree Sita and Shree Ram have told me to tell you that They are on top of the Kantanath parvat and are very hungry so please bring them some food.”

24th Baithak of Mahaprabhuji, located at Chitrakut. on Shri Kantanath Parvat (श्री कान्तानाथ पर्वत,सतना), Satna, Madhya Pradesh.
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Shri Mahaprabhu ji then went up on the parvat and saw Shree Sita and Shree Ram sitting with Laxshman by their side holding the Chattar. Hanumanji stood by with folded hands. Shree Ram, taking Shri Mahaprabhuji’s hand made him sit next to him on his jewelled throne. After Shree Ram and Shree Sita partook of the bananas, Laxshman ji and Hamunan ji took the remains.

Shri Kantanath Parvat (श्री कान्तानाथ पर्वत,सतना) कान्तानाथ पर्वत श्री गिरिराज जी के भाई हैं

Kantanath Parvat (कान्तानाथ पर्वत,सतना),

On the Kantanath Parvat, Mahaprabhuji Vallabh Achary narrated Shrimad Bhagavatam. He also narrated the pavitr Ramayan Granth; explaining the legends of Shree Ram and Sita mata.

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Shree Ram-Bharat milap pracheen sthal at Chitrakut

He also narrated the pavitr Ramayan Granth; explaining the legends of Shree Ram and Sita mata. Shree Hunumanji, daily came and stood on one foot when hearing the pavitr varta. Though Mahaprabhuji requested him to take his seat, Hanumanji refused saying that he had taken a sankalp.

24th Baithakji at Chitrakut; Mahaprabhu Vallabhachary explained that the Kantanath parvat is the brother of Shri Giriraj Parvat, therefore we should not walk on the sacred mountain.
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At Kantanath Parvat Parikrama marg, Chitrakut

On the Kantanath Parvat, Mahaprabhuji Vallabh Achary narrated Shrimad Bhagavatam. He also narrated the pavitr Ramayan Granth; explaining the legends of Shree Ram and Sita mata. Shree Hunumanji, daily came and stood on one foot when hearing the pavitr varta.

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Jai ShreeNathji

जय श्रीनाथजी प्रभु 🙏

What are Pushtimarg Baithaks?

Baithaks in Pushtimarg religion are pavitr places where Shri Vallabhachary, the founder of Pushtimarg, narrated the Pavitr Bhagvad Katha. They are total 84 in number and spread all over the country.

Mahaprabhuji had circled the whole of India three times and done sthapna of these various Baithaks.

Each Baithak has its own particular Charitr (description).

Baithaks are holy places where there is no Idol or Chitr (Picture); seva is done of Gaddi (Seating).

Sunrise on Giriraj Parvat

Shri Giriraj Govardhan Parvat-Vraj Mandal Jai ShreeNathji-Jai Shree RadhaKrishn

१५-०१-२०१९ का ये छोटा सा विडीओ आप के लिए 🙏

यूँ लगता है सूर्य देव बादल के माध्यम से गिरिराज जी को नमन कर रहे हैं

सुबह का यह दृश्य आलोकिक है, कुछ पल के लिए गिरिराज जी सूर्य की इस अद्भुत लालिमा में डूब जाते हैं।

चाहती तो हूँ की समय यहीं पर कुछ समय रूक जाए और यह दिव्य नज़ारा हम निहारते रहें।

किंतु प्रकृति तो किसी के लिए इंतज़ार नहीं करती, और देखते ही देखते २-५ मिनट में यह लालिमा पूर्ण हो जाती है।

Video clip shot early morning on iPhone xs

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Jai Ho 🙏