Surrender

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

श्री कृष्ण चरणों में समर्पित यह जीवन यात्रा,

श्रीनाथजी ठाकुरजी की कृपा पात्र;

यहीं है आख़िरी मंज़िल इस जीव आत्म की; कहीं और भटकने की ज़रूरत अब नहीं

जय श्री राधे कृष्ण 🙏

जहाँ श्री राधा कृष्ण लीला में डूब जाने को मन, शरीर, आत्मा और दिल करे, वो व्रज धाम, श्रीनाथजी ठाकुरजी की प्रिय लीला भूमि;

The 84 Kos of Divine Land which Appeared on Earth from Golok, at the request of Shree Radha, is where this soul will find the final rest;

the merging with the Presence of Thakurjee ShreeNathji; who permanantly resides on sacred Shri Govardhan, with Shree RadhaKrishn and all His Sevaks and Gwal Bals

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

श्रीनाथजी के साक्षात्कार जून २००५ में, उनके मुखारविंद, श्री गोवर्धन

वह भव्य, दिव्य व्रज भूमि, जो साक्षात गोलोक है, नेत्र और आत्म में शुद्धता होने से आलोकिकता महसूस होने लगे, तो समझिए श्रीजी की कृपा बरस रही है 🙏

श्री राधा, श्री कृष्ण-दिव्य प्रेम के पूर्ण प्रतीक इस पृथ्वी पर हमें एहसास दिलाते हैं, जागो और मुझ में समा जाओ, श्रीनाथजी ठाकुरजी जिनके संविलीन स्वरूप आज हमारे बीच हैं 🙏

An original Varta about ShreeNathji Prabhu – ‘Toad ka ghana’ (forest)

टोड के घने-श्रीनाथजी वार्ता
An original varta about ShreeNathji Prabhu – Toad ka ghana (forest)

संवत १५५२ श्रावण सुद तेरस बुधवार के दिन श्रीनाथजी टोड के घने पधारे थे:

कुंभनदासजी श्रीनाथजी की सेवा में नित्य कीर्तन करके श्रीनाथजी को रिझाते थे।श्रीनाथजी उनको अपना सानुभव जताते थे। वे साथ साथ खेलते रहते थे और बाते भी किया करते थे.
वार्ता :
थोड़े ही दिनोंमें एक यवन(Mughal kings)का उपद्रव इस विस्तारमें शुरू हुआ। वह सभी गांवोंको लूटमार करके पश्चिमसे आया। उसका पड़ाव श्री गिरिराजजीसे लगभग सात किलोमीटर दूर पड़ा था।
सदु पांडे, माणिकचंद पांडे, रामदासजी और कुंभनदासजी चारों ने विचार किया की यह यवन बहुत दुष्ट है और भगवद धर्म का द्वेषी है। अब हमें क्या करना चाहिये ?
यह चारों वैष्णव श्रीनाथजीके अंतरंग थे।
उनके साथ श्रीनाथजी बाते किया करते थे। उन्होंने मंदिरमें जाकर श्रीनाथजी को पूछा कि महाराज अब हम क्या करें ? धर्म का द्वेषी यवन लूटता चला आ रहा है। अब आप जो आज्ञा करें हम वैसा करेंगें।

श्रीनाथजीने आज्ञा करी कि हमें टोंड के घने में पधारने की इच्छा है वहां हमें ले चलो। तब उन्होंने पूछा कि महाराज इस समय कौन सी सवारी पर चले? तब श्रीनाथजी ने आज्ञा करी, “सदु पांडे के घर जो पाडा है उसे ले आओ। मैं उसके ऊपर चढ़कर चलुंगा”।
सदु पाण्डे उस पाड़ा को लेकर आये. श्रीनाथजी उस पाड़ा पर चढ़कर पधारें। श्रीनाथजी को एक तरफ से रामदासजी थांभ कर चल रहे थे और दूसरी तरफ सदु पांडे थांभ कर चल रहे थे.
कुंभनदास और माणिकचंद वे दोऊ आगे चलकर मार्ग बताते रहते थे।

टोंड के घने में एक चौतरा है और छोटा सा तालाब भी है। एक वर्तुलाकार चौक के पास आके रामदासजी और कुंभनदासजी ने श्रीनाथजी को पूछा, “आप कहाँ बिराजेंगे”?
तब श्रीनाथजीने आज्ञा करी कि हम चौतरे पर बिराजेंगे। श्रीनाथजी को पाड़े पर बिठाते समय जो गादी बिछायी थी उसी गादी को इस चौतरे पर बिछा दी गई और श्रीनाथजी को उस पर पधराये.

चतुरा नागा नाम के एक विरक्त भगवद भक्त थे वे टोड के घने में तपस्या किया करता थे। वे गिरिराजजी पर कभी अपना पैर तक नहीं रखते थे।
मानों उस चतुरा नागा को ही दर्शन देनेके लिए ही श्रीनाथजी पाडा पर चढ़कर टोंड की इस झाड़ी में पधारें,
चतुरा नागा ने श्रीनाथजी के दर्शन करके बड़ा उत्सव मनाया। बन मे से किंकोडा चुटकर इसकी सब्जी और आटे का हलवा (सीरा) बनाकर श्रीनाथजी को भोग समर्पित किया।

दूसरी वार्ता:
इसके बारे में दूसरा उल्लेख यह भी है कि श्रीनाथजी ने रामदासजीको आज्ञा करी कि तुम भोग धरकर दूर खड़े रहो।
तब श्री रामदासजी और कुंभनदासजी सोचने लगे कि किसी व्रज भक्त तके मनोरथ पूर्ण करने हेतु यह लीला हो रही है।
रामदासजी ने थोड़ी सामग्री का भोग लगाया तब श्रीनाथजी ने कहा कि सभी सामग्री धर दो।
श्री रामदासजी दो सेर आटा का सीरा बनाकर लाये थे उन्होंने भोग धर दिया।
रामदासजी ने जताया कि अब हम इधर ठहरेंगें तो क्या करेंगें ? तो श्रीनाथजी ने कहा कि तुमको यहाँ रहना नहीं है।
कुम्भनदास, सदु पांडे, माणिक पांडे और रामदासजी ये चारों जन झाड़ी की ओट के पास बैठे।
तब निकुंजके भीतर श्री स्वामिनीजीने अपने हाथोंसे मनोरथ की सामग्री बनाकर श्रीनाथजी के पास पधारे और भोग धरे।
श्रीनाथजी ने अपने मुख से कुंभनदासको आज्ञा करी,“कुंभनदास इस समय ऐसा कोई कीर्तन गा तो मेरा मन प्रसन्न होने पावे। मै सामग्री आरोंगु और तु कीर्तन गा”।
श्री कुम्भनदासने अपने मनमें सोचा कि प्रभुको कोई हास्य प्रसंग सुननेकी इच्छा है ऐसा लगता है।
कुंभनदास आदि चारों वैष्णव भूखे भी थे और कांटें भी बहुत लगे थे इस लिये कुंभनदासने यह पद गाया :
राग : सारंग
“भावत है तोहि टॉडको घनो ।
कांटा लगे गोखरू टूटे फाट्यो है सब तन्यो ।।१।।
सिंह कहां लोकड़ा को डर यह कहा बानक बन्यो ।
‘कुम्भनदास’ तुम गोवर्धनधर वह कौन रांड ढेडनीको जन्यो ।।२।।

यह पद सुनकर श्रीनाथजी एवं श्री स्वामिनीजी अति प्रसन्न हुए। सभी वैष्णव भी प्रसन्न हुए।

बादमें मालाके समय कुंभनदासजीने यह पद गाया :
बोलत श्याम मनोहर बैठे…
राग : मालकौंश
बोलत श्याम मनोहर बैठे, कमलखंड और कदम्बकी छैयां
कुसुमनि द्रुम अलि पीक गूंजत, कोकिला कल गावत तहियाँ ।। 1 ।।

सूनत दूतिका के बचन माधुरी, भयो हुलास तन मन महियाँ ।
कुंभनदास ब्रज जुवति मिलन चलि, रसिक कुंवर गिरिधर पहियाँ ।। 2 ।।

यह पद सुनकर श्रीनाथजी स्वयं अति प्रसन्न हुए। बादमें श्री स्वामिनीजी ने श्रीनाथजी को पूछा, “आप यहाँ किस प्रकार से पधारें”? श्रीनाथजी ने कहा, “हम सदु पांडेके घर जो पाड़ा था उस पर चढ़कर हम पधारे हैं”।
श्रीनाथजी के इस वचन सुनकर स्वामिनीजीने उस पाड़ा की ओर दृष्टि करके कृपा करके बोलीं, “कि यह तो हमारे बाग़ की मालन है। वह हमारी अवज्ञा से पाड़ा बनी है पर आज आपकी सेवा करके उसके अपराध की निवृत्ति हो गई”।

इसी तरह नाना प्रकारे केली करके टोड के घने से श्री स्वामिनी जी बरसाना पधारें।
बादमें श्रीनाथजी ने सभी को जो झाड़ी की ओट के पास बैठे थे उनको बुलाया और सदु पांडे को आज्ञा करी कि अब जा कर देखो कि उपद्रव कम हुआ ?
सदु पांडे टोड के घनेसे बाहर आये इतने मे ही समाचार आये कि यवन की फ़ौज तो वापिस चली गई है। यह समाचार सदु पांडे ने श्रीनाथजी को सुनाया और बिनती की कि यवन की फ़ौज तो भाग गई है तब श्रीनाथजी ने कहा कि अब हमें गिरिराज पर मंदिरमें पधरायें।

इसी प्रकारे आज्ञा होते ही श्रीनाथजी को पाड़े पर बैठा के श्री गिरिराज पर्वत पर मंदिर में पधराये।
यह पाड़ा गिरिराज पर्वत से उतर कर देह छोड़कर पुन: लीलाको प्राप्त हुआ।
सभी ब्रजवासी मंदिरमें श्रीनाथजीके दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुए और बोले की धन्य है देवदमन ! जिनके प्रतापसे यह उपद्रव मिट गया।

इस तरह संवत १५५२ श्रावण सुदी तेरस को बुधवार के दिन चतुरा नागाका मनोरथ सिद्ध करके पुन: श्रीनाथजी गिरिराजजी पर पधारें।

यह पाड़ा अनंत लीला में कौन था:
यह पाड़ा दैवी जीव था। लीला में वो श्री वृषभानजी के बगीचा की मालन थी। लीला में उसका नाम वृंदा है।
नित्य फूलोंकी माला बनाकर श्री वृषभानजी के घर लाती थी।
एक दिन श्री स्वामिनीजी बगीचा में पधारें तब वृंदा के पास एक बेटी थी उसको वे खिलाती रही थी। उसने न तो उठकर स्वामिनी जी को दंडवत किये कि न तो कोई समाधान किया।
फिर भी स्वामिनीजी ने उसको कुछ नहीं कहा। उसके बाद श्री स्वामिनीजी ने आज्ञा की के तुम श्री नंदरायजी के घर जाकर श्री ठाकोरजीको संकेत करके हमारे यहां पधारने के लिए कहो; तो वृंदा ने कहा की अभी मुझे मालाजी सिद्ध करके श्री वृषभानजी को भेजनी है तो मैं नहीं जाऊँगी.
ऐसा सुनकर श्री स्वामिनीजीने कहा, “मैं जब आई तब उठकर सन्मान भी न किया और एक काम करने को कहा वो भी नहीं किया। इस प्रकार तुम यह बगीचा के लायक नहीं हो। तू यहाँ से भुतल पर पड़ और पाडा बन जा”।

इसी प्रकार का श्राप उसको दिया तब वह मालन श्री स्वामिनीजी के चरणारविन्दमें जा कर गिर पडी और बहुत स्तुति करने लगी और कहा कि आप मेरे पर कृपा करों जिससे मैं यहां फिर आ सकुं।
तब स्वामिनीजी ने कृपा करके कहा की जब तेरे पर चढ़कर श्री ठाकुरजी बन में पधारेंगें तभी तेरा अंगीकार होगा।
इसी प्रकार वह मालन सदु पांडे के घर में पाड़ा हुई और जब श्रीनाथजी उस पर बेठ कर वन में पधारे तब वो पुन: लीलाको प्राप्त हुई.

जय श्रीनाथजी ठाकुरजी 🙏
जय श्री राधे कृष्ण 🙏

Points for this varta taken from this site:

https://www.facebook.com/mohanjigokul/

यह टोंड के घनेमें श्रीनाथजी की बैठक है जहाँ सुंदर मंदिर व बैठकजी बनाई गई है।

 

 

 

 

Jai ShreeNathji

Jai Shree RadhaKrishn

#ShreeNathjiBahkti #Govardhan

 

 

 

 

 

 

Shri Vallabh Acharya 22nd Baithakji at Maan Sarovar- Vraj

 

Shri Vallabh Acharya 22nd Baithakji at Maan Sarovar, Mathura

 

Here are some pictures displayed from my visit to the 22nd Baithak of Mahaprabhuji, located at Maan Sarovar,opposite Yamunaji, Maant, Mathura, Vraj Mandal.

Baithakji Charitr: (बैठकजी चरित्र)

Shri Mahaprabhu Vallabhachayra stayed for three days at Maan Sarovar discussing the Shrimad Bhagavat.

Once, Damala awoke in the middle of the night and noticed that his guru was missing.

A few hours later, Shree Krishn appeared before Damala who exclaimed, “Today I am certainly blessed to have your supreme vision. “

Shree Krishn than told Damala, “Today, Shrew Radha has become very displeased with me.”

Later, Shree Radha came to meet Thakurjee and Their reuinon was re established.

Damala and Shri Mahaprabhuji had the sight of this divine pastime. All of this transpired while the other Vaishnavas were deep in sleep.

 

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

What are Pushtimarg Baithaks?

Baithaks in Pushtimarg religion are pavitr places where Shri Vallabhachary, the founder of Pushtimarg, narrated the Pavitr Bhagvad Katha. They are total 84 in number and spread all over the country.

Mahaprabhuji had circled the whole of India three times and done sthapna of these various Baithaks.

Each Baithak has its own particular Charitr (description).

Baithaks are holy places where there is no Idol or Chitr (Picture); seva is done of Gaddi (Seating).

“ShreeNathji Sakshatkar darshans on Girirajji”

“ShreeNathji Sakshatkar darshans on Girirajji”: Prabhu ShreeNathji and Gurushree’s kripa

श्री ठाकुरजी के साक्षात दर्शन, उनके मुखारविंद, जतीपुरा में; आज से ठीक १३ साल पहले; ऐसी कृपा की कोई और मिसाल नहीं है।

दर्शन भी दिए और फ़ोटो भी लेने दिया; २०१४ में हमें आज्ञा भी दी सभी वैष्णव के साथ शेर करने की: क्या ऐसा कभी पहले हुआ है?

This divine leela happened 13 years ago on the auspicious day of 9th June 2005, at ShreeNathji Mukharwind, Giriraj Govardhan, Jatipura, with kripa of Gurushree Sudhir bhai; and only because of his close sakha bhav with prabhu ShreeNathji.

We all wonder what Shree Prabhu looks like!

The only True photo of ShreeNathji, Shree GovardhanNathji, Shree Thakurjee, Shree Dev Daman: In His Child Swarup.

Please take a moment and see for yourself in the photo above, just below the point where I am applying tilak; complete Face of Shree Thakurjee is visible as this (white) Ujjaval Urja (energy). This divine face Appeared for the duration of my pujan and Gurushree clicked the photos. The mukut, mor pankh, tilak, earrings, long black hair, both palms holding His own face and watching me do pujan, is ShreeNathji giving darshans of His Lalan swarup.

(Just for the record: it is not photoshopped, nor tampered in any way.

Details can be read on our website: http://www.govardhan.org.in

Given to us and ordered to share with His bhakts all over the world.

Thank you Prabhu for this kripa on all Your bhakts.

ShreeNathji Sakshatkar photo

ShreeNathji Sakshatkar from His Mukharvind

Jai ShreeNathji

ShreeNathji enjoys sports day at a school.

ShreeNathji – His ” LIVE” interactions Varta in today’s time period

श्रीनाथजी से दिव्य  वार्तालाप आज के ज़माने मैं..

ShreeNathji enjoys sports day at a school.

श्रीनाथजी, “मैं ६ बजे तेरे यहाँ आ गया और मेरी छवि मैं बैठ गया था, फिर जल्दी से भागा और उसके साथ गाडी में बैठ गया”…

image

1st November 2006

It is my child’s sports day today.
She has always been a very good athlete, and is excited, though a little nervous. She has to leave very early for the sports ground. Before leaving she prays to ShreeNathji for His blessings. (Shreeji’s large Chavi is in our living room and we pass it always when leaving the house).

As I am not going with her, I call my dear close friend, Millie who would be there at the sports ground, and request her to keep me posted about happenings at the races. Few hours into the event I receive her call, saying that my child has won gold in all the events. She won five gold medals in athletics this year.

As the varta goes:

A day earlier to the sports day, I had called up my Gurushree, Shri Sudhirbhai, asking for blessings for my child; so now I call up to inform him about her accomplishments.

Gurushree, is delighted and I hear him thanking ShreeNathji also.

Later that same night I have this very incredible vivid conversation with ShreeNathji Himself who describes His version of the sports event!

Writing it exactly as it went:

श्रीजी मुझसे कहेते हैं, “कल जब तुम सुधीर से फ़ोन पर बात कर रही थी मैं सुधीर के पास ही था. मैंने उसको पूछा की ये स्पोर्ट्स डे क्या होता है? आभा क्या बात कर रही है?
Shreeji tells me, “Yesterday, when you were talking to Sudhir on the phone, I was there with him. I asked him what sports day means. What is Abha talking about?

श्रीजी आगे बताते हैं, “तो सुधीर ने मुझे समझाया की स्कूल के बच्चों की प्रतियोगिता होती है, और मुझसे पूछा की आप वहां जाकर देखना चाहते हैं? मैंने हाँ करी.
Shreeji continues, “Sudhir explained to Me that it is a school competition, and asked Me if I wished to go there and see how it happens. I said yes to him”.

श्रीजी- “अरे, इसने (सुधीर) बोला तो मैं वहां गया. नहीं तो मैं ऐसे कहीं किसी के साथ नहीं जाता”.
Shreeji- “Arrey, Sudhir told me to go, that is why I went there. Other wise I never go any where with anyone like this.

श्रीजी- “फिर समस्या हुई की मुझे कैसे पता चलेगा कहाँ जाना है? सुधीर ने सुझाव दिया की सुबह जल्दी आभा के यहाँ चले जाना और बच्ची के साथ में ही स्पोर्ट्स ग्राउंड चले जाना”.
Shreeji- “Then rose the problem of how will I know where to go? Sudhir guided Me saying that I should go early to Abha’s house. From there I can go with her child to the sports ground.

श्रीजी आगे बताते हैं, “इसलिए मैं सुबह ६ बजे से तेरे यहाँ आ गया था; मेरी बाहर वाली छवि मैं बैठ गया. सुबह तैयार होकर तेरी बच्ची मेरे पास आई प्रणाम करने और आशीर्वाद के लिए”.
“फिर जब देखा की वोह निकल रही है, जल्दी से भागा और उसके साथ गाडी में बैठ गया. क्यों की मालूम नहीं था की कहाँ जाना है”.
Shreeji continues, “So early morning at 6 I reached your house and sat down in My Chavi which is outside in the hall. Your child came to Me to do her pranam and for blessings, before she left. As soon as I saw her leave, I also ran and sat in the car with her; as I did not know where to go.

श्रीजी- “स्पोर्ट्स मैदान में, मैं उसके पीछे खड़ा हो गया, क्योंकि मालुम ही नहीं था की क्या करना है”. “फिर सब भागने लगे, और तेरी बच्ची भी तेज़ी से भागी. मैं तो खड़ा ही रह गया.वोह पहले नंबर पर आई, और खूब जोर से ताली बजी;
Shreeji- “At the sports ground I stood behind her, as I just did not know what to do”. “Then suddenly all began to run and your child also ran fast. I was just left standing there alone. She came first and all clapped loudly for her.

श्रीजी थोड़ी सी उदास आवाज़ में आगे बताते हैं, “लेकिन मुझे कोई नहीं देख रहा था. मैं खड़ा रहा, समझ में नहीं आया क्या करूँ. लेकिन मज़ा आया. बहुत धूप थी, और गर्मी भी.
Shreeji continues a little sadly, “But no one was looking at Me. I just stood there as I did not understand what to do.
It was a lot of fun. But it was very sunny and hot.

श्रीजी- “थोड़ी थोड़ी देर में मैं तेरी बच्ची का चेहरा देख लेता था, मैं सही जगह पर ही हूँ न.
वहाँ कई बच्चे कागज़ खोल कर कुछ खा रहे थे, वो क्या होता है?
Shreeji- “Every few minutes, I would look at your child’s face; and made sure that I am yet in the right place. Many children were eating something from a paper packet, what was that?”

आभा- “श्रीजी, वो सैंडविच होगा, सब बच्चे पसंद करते हैं”.
Abha- “Shreeji, that must be a sandwich. Most of the children enjoy eating that.

आभा- “श्रीजी यह तो बताइये की आपको कैसा लगा? आशा है की स्पोर्ट्स डे में आपको मजा आई. आपने कभी ऐसा देखा ही नहीं होगा”.
Abha- “Shreeji, how did You like being there, hope you enjoyed the Sports day and had fun. I am sure You must have never seen anything like this before”.

श्रीजी शिकायत के लहजे में, “अरे, सब कितनी आवाज़ करते हैं! बहुत गर्मी भी थी वहां. वोह लोग ऐ.सी (AC)रूम में क्यों नहीं भागते हैं?
Shreeji in a complaing tone, “Arrey, these children make so much noise! It also became very hot. Why don’t these children run in an AC room?”

मुझे हँसी आती है. “श्रीजी इसलिए की बहुत बच्चे होते हैं इतना बड़ा कमरा कहाँ से लाएँगे”.
I burst in laughter. “Shreeji, maybe because there are a lot of children. It is not possible to get such a large room for sports events”.

श्रीजी नटखट आवाज़ में कहते हैं, “हाँ.. फिर तो उनको एक छोटा ए.सी (AC) साथ लेकर दौड़ना चाहिए, अपने अपने सर के ऊपर. हा हा हा. लेकिन वोह चलेगा कैसे”.
और यह देखो, धूप में मैं कितना काला हो गया”. श्रीजी मजाक में कहते हैं.
Shreeji continues talking in His naughty tone, “Han.. But then they should all run with a small AC fitted on their head. Ha Ha, but then how will the AC work”.
Also just see, how black and dark I have become in the sun..” Shreeji jokes.

श्रीजी आगे कहते हैं, “बहुत बच्चे थे, मुझे आनंद आया. पहले मैंने सोचा की तेरी बच्ची को उठा कर जल्दी से आगे रख दूँ, पर सुधीर की कही हुई बात याद आ गयी। उसने बोला था, ‘श्रीजी कोई मस्ती नहीं करना वहाँ पर. सब लोग घबरा जायेंगे. कुछ नुक्सान भी नहीं होना चाहिए. फिर जब मन करे, आप वापस आ जाना’.
Shreeji continues with His dialogue, “There were a lot of children, I enjoyed Myself. Initially I had thought of lifting your child and putting her directly on the finish line. But I remembered Sudhir’s warning. He had told Me not to do any mischief and just watch. Sudhir had explained that I should not cause any problem, as it could frighten the people present there. And whenever I feel like it, I could leave and go back”.

My child also told me later. “I felt very confident and there was no exhaustion after running the races. There was no negative thought in my mind”. (She had won gold in all the three running events).
I explained God’s blessings to her, her own faith in Shreeji, and His Presence in our house. We both did a dhoop for Shreeji and thanked Him for His blessings.

The same day later Millie too told me that as she entered the sports ground, she smelt the fragrance of Nathdwara Prasad. She looked around her, but there was no tree or foliage from which the fragrance could come. It all felt very divine. While returning also, at the same point; she could smell the Nathdwara Prasad fragrance again.
This might be because of ShreeNathji’s Live Presence as Lalan in that area. And Millie is His bhakt.

Some happenings are un explainable and incredibly divine in nature. They cannot be explained in worldly language and can be understood and accepted only in faith and bhakti.

(For those who have never eaten the prasad from Nathdwara, Shreeji’s prasad has the typical fragrance of kapur( camphor) and some added spices which is very typical of the Nathdwara Haveli prasad).

It is always kripa of God and Guru, that one can be fortunate enough to be a nimit for such divine interactions.

My pranam to my Gurushree and MahaGurushree, I am humbled by this divyata in my life and the divine love and kripa that I am showered with!

Jai Shreeji
Jai Shree Radhe Krishn!

पूर्णता से समर्पित मेरे श्रीजी के चरणों में

With Thakurjee’s desire and my Gurushree’s permission this present day leela and Khel is being made public. It is ShreeNathji’s Love for His bhakts.
ठाकुरजी के भक्त उनकी मीठी और दिव्य खेल और लीला का आनंद उठा सकते हैं।
और लीला मेरे इसी फ़ेस बुक पेज पर आपको मेलिगी। ज़रूर पढ़िए और आनंद लीजिए
Many more Live leela with ShreeNathji can be read on my face book page: abha shahra Shyama.

ShreeNathji’s Udhva Bhuja Blesses!!

ShreeNathji LIVE Varta in todays time period with His bhakts

ShreeNathji’s Udhva Bhuja Blesses!!

श्रीजी उनकी उद्धव भुजा नीचे लाते है और मेरे सर पर बहुत अलोकिक प्रेम और दुलार से आशीर्वाद देते हैं.

ShreeNathji

ShreeNathji

19-20 September 2005

At Nathdwara, as I rested in the afternoon, after Rajbhog darshans, this Divine happening, I experienced in full awareness. I experienced this incredible blissful darshans as a vision of me holding on to Shreeji’s little toes.

नाथद्वारा में, राजभोग दर्शन के बाद जब मैं आराम कर रही थी, पूर्ण जागृत स्थिति में यह दिव्य अनुभूति  मुझे हुई. श्रीजी के छोटे, कोमल पग को पकडे हुऐ यह भाव मुझे कुछ अनोखे आनंदमय मन की स्थिति में हुआ.

It is the Mangala darshan, at Shreeji’s Haveli. I can see myself there, pressing Shreeji’s feet, while He is having a conversation with me!

श्रीनाथजी  की हवेली में मंगला दर्शन हो रहे हैं और मैं श्रीजी के पग दबा रही हूँ. श्रीजी मुझसे वार्तालाप भी कर रहे हैं!

Shreeji is complaining to me how tired He gets standing every day.

श्रीजी मुझसे कह रहे हैं की वोह खड़े रहकर कितने थक गए हैं.

“See, my Feet hurt soo much, but nobody presses Them. I think, I might just leave Nathdwara and run away”.

“देखो मेरे पग कितने दुखते हैं, कोई दबा के नहीं देता. मैं सोचता हूँ की नाथद्वारा छोड़ कर भाग जाऊं.

I again ask Shreeji, “Shreeji, Your Arm must be hurting also. Since Hundreds of years You have been holding Your Udhva Bhuja up”.

मैं फिर श्रीजी से पूछती  हूँ , “श्रीजी, आप की उद्धव भुजा भी तो दुखती होगी? इतने सालों से आप ने ऊपर उठा कर रखी है”.

Shreeji replies, “Yes, you are very right, My Left Arm also hurts”.

श्रीजी जवाब देते हैं, “तुम ठीक कहती हो. मेरी उद्धव भुजा भी दुखती है” .

Incredibly, at that moment;

SHREEJI BRINGS HIS LEFT BUHJA DOWN AND CARESSED MY HEAD AND FACE IN ALOKIK LOVE AND BLESSING.

आश्‍चर्यजनक रूप से उसी पल में;

श्रीजी उनकी उद्धव भुजा नीचे लाते है और मेरे सर पर बहुत अलोकिक प्रेम और दुलार से आशीर्वाद देते हैं.

What name can I give to such an alokik anubhav!

ऐसे अलोकिक अनुभव को क्या नाम दे सकते हैं!

This close encounter lasted for a whole 45 minutes.

I woke up and was so lost in this experience; I had to ask Gurushree about it.

It seemed he already knew about it and silenced me, telling me not to mention it to anyone for the time being.

Gurushree explained to me, “These are real darshans and you were not dreaming”.

गुरुश्री मुझे समझाते हैं, “यह वास्तविक दर्शन हैं और तुम सपना नहीं देख रही थी”.

It was for sure a real happening, or else how am I able to actually feel that touch from Shreeji’s Udhav Bhuja even after all these years. Till today I am able to feel Shreeji’s tender, gentle hand on my head and the extraordinary Divya Urja that came from Shreeji.

यह एक वास्तविक दर्शन ही हैं क्योंकि आज भी, जब मैं यह अनुभव लिख रही हूँ, या फिर इसके बारे में कभी सोचती हूँ, मुझे श्रीजी के कोमल हाथ अपने  माथे पर महसूस होते हैं और मैं उसी दिव्य ऊर्जा के कम्पन का अहसास करती हूँ.

This has to be some Grace and Kripa from my Gurushree and MahaGurushree, ShreeNathji, that I have been the receiver of this Divine Love and Blessings.

MahaGurushree, Shreeji Ki Jai Ho!!

Jai Ho Thakurjee!

ShreeNathji Live Darshans at Rajbhog, in Nathdwara mandir, on Ekadasi:

 

श्रीनाथजी ठाकुरजी से एक दिव्य वार्तालाप और लीला..Divya conversation and leela with Shree Thakurjee in today’s time period”.

Miracle Live Darshans at Rajbhog, in Nathdwara mandir

श्रीनाथजी के आलोकिक दर्शन नाथद्वारा हवेली; राजभोग में,

“..तुरंत मुझे श्रीजी की  नटखट मधुर खिलखिलाहट कान में सुनी..”

(This post has been published in Hindi and English to make it easily readable to all bhakts)

img_7111

14th June 2008

आज भी हमारे बीच श्रीनाथजी अपना हवेली मंदिर छोड़ कर अपने चहेते भक्त के साथ खेलने जाते हैं.

ऐसा लगता है की ६०० साल पुरानी एतिहासिक वैशनव वार्ता एक बार फिर ठाकुरजी हमारे बीच दोहरा रहे हैं, अपने कुछ भक्तों के साथ लीला करते हैं. 

Even today in our present time period, ShreeNathji leaves His Haveli Mandir to play with His Bhakts. This is like a repeat of the Vaishnav Vaartas from five hundred years ago, when He interacted with His chosen bhakts in the most Live manner.

आगे पढ़िए..

Read on…

इस वार्ता में आपके साथ मैं एक बहुत ही अधभुत और दिव्य अनुभूति  शेर करना चाहती हूँ. नाथद्वारा में घटित यह प्रभु की आलोकिक लीला और खेल है.

I share my very special day at Nathdwara, when something very unique and miraculous happened. This very auspicious day was:

 १४ जून २००८- निर्जला एकादसी; ज्येष्ठ सूद ग्यारस 

14 June 2008 – Nirjala Ekadasi; Jyesth Sud gyaras

बहुत भीड़ होने के बावजूद हमने सुबह के तीनों दर्शन शांति पूर्ण करे. आश्चर्य होता है की इतनी भीड़ के बावजूद सभी भक्त नाथद्वारा के पतली गली और मंदिर परिसर में समा जाते हैं. 

We completed the three morning darshans in peace; though because of the extreme crowds it becomes difficult even to walk at a regular pace. It is incredible how so many bhakts are accommodated in the narrow lanes and the mandir parisar.

आज राजभोग दर्शन(हर दिन का यह चौथा दर्शन होता है)में श्रीजी ने यह अधभुत और दिव्य खेल खेला.  बड़े मुखियाजी आज सेवा में है. हम ‘डोलती बारी’ में श्रीनाथजी के सम्मुख दर्शन का आनंद ले रहे हैं. मुखियाजी श्रीजी का श्रींगार पूर्ण कर रहे हैं.

It was in Rajbhog Darshans (This is the fourth darshan of the day) that Shreeji did this unique leela. It was the senior Mukhiyaji in sewa today. We stood praying in the Dolti Baari,(darshan hall) before Shreeji, and watched Mukhiyaji complete the final Shringar for Shreeji.

जिन भक्त को नाथद्वारा दर्शन के लिए आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वे जानते हैं की राजभोग दर्शन में श्रीनाथजी को बाँसुरी जी और छड़ीजी चढ़ाई जाती है. उनके बग़ल में ३ या ४ कमल भेंट करते हैं. 

All who may have been here know that Shreeji is offered His Bansuri jiand Chadi ji in the Rajbhog darshan. His three or four Kamal are also offered on His arms, around His waist.

मैं शांत और गम्भीरता से मुखियाजी को श्रीनाथजी का शृंगार धरते दर्शन कर रही हूँ. मुखियाजी श्रीनाथजी को पहले दो कमल धर चुके हैं, जो श्रीजी ने स्वीकार कर लिए. आश्चर्य हुआ की जब वे तीसरा कमल चढ़ाते हैं तो श्रीजी स्वीकार नहीं करते हैं. 

I stand at peace, transfixed as I watch Mukhiyaji complete Thakurjee’s shringar. He carefully places the first two Kamal flowers on Shreeji’s waist; but surprisingly, as he tries placing the third one, Shreeji refused to accept this lotus.

 

अचानक उसी पल मुझे श्रीजी की मधुर गूँज अपने कान में सुनाई दी, “अरे हटाओ मुझे चुबता है” 

Instantly at the same moment I hear Shreeji’s sweet, melodious voice whisper in my ears,”Arrey, take it away, it pricks Me”

उसी पल हमने देखा की मुखियाजी तीसरा कमल फूल श्रीजी से दूर हटा रहे हैं . श्रीजी जो मेरे कान में बोल रहे थे, उसी पल मुखियाजी वह आदेश का पालन सामने  सेवा में कर रहे थे.  

In that immediate moment I saw Mukhiyaji take the third lotus away from Shreeji. It was in perfect timing as I heard Shreeji say these words in my ears, that the Mukhiyaji also followed the same instructions in sewa.

नियम है की अगर श्रीजी अंगीकार नहीं करते तो सेवा कर रहे मुखियाजी साक्षात दण्डवत से माफ़ी माँगते हैं, जो उन्ने अभी करी.

When Shreeji refuses anything the Mukhiyaji doing sewa has to do a shashtang bow and ask for forgiveness; which he did.

तुरंत मुझे श्रीजी की  नटखट मधुर खिलखिलाहट कान में सुनी,“देखो मैंने कमल नहीं लिया  उसको बोला हटाओ, हा हा हा; मैं ऐसे ही खेल करता हूँ”.

Immediately I heard Shreeji’s naughty laughter in my ear,“See I did not accept it, told him to remove it. Ha, ha, ha, I like to Play in this way”.

मुझे अपने आँख और कानों पर भरोसा नहीं हो रहा है. यह तो साक्षात दर्शन की कृपा है, ठाकुरजी की. श्रीनाथजी हमारे इतने नज़दीक से लीला कर रहे हैं. मैंने गर्दन घुमाई लेकिन ऐसा लगा की सबने देखा लीला को किंतु किसीने यह आवाज़ नहीं सुनी और समझे नहीं श्रीजी का खेल.परम आनंद है. हमने आरती पूरी करी, दण्डवत करके डोलती बारी से बाहर आ गए.

I could not believe my eyes and ears. This was Sakshat Darshans. Shreeji was here with us blessing us so closely. I looked around, but though all saw what had happened, no one else seemed to hear Shreeji’s voice. What bliss! We did the Aarti, bowed and left.

दर्शन करके जैसे ही हम हवेली से बाहर निकले, मुझे फिर से श्रीजी की मौजूदगी का एहसास हुआ. श्रीजी की मधुर आवाज़ सुनाई दी, जो नटखट, मस्ती भरी स्वर में बातचीत कर रहे थे;

As we walked out of the Haveli, I again realized Shreeji’s Presence with us. I hear His sweet voice again, speaking in a very amused and naughty tone;

श्रीजी कह रहे थे: “मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ. आज मुझे बहुत मज़ा आया, वोह मुखिया को मैंने बेवकूफ बनाया; हा हा हा. मुझे कुछ नहीं चुबता था.  वह तो आज तुमको मेरा खेल दिखाना चाहता था.  तू हमेशा बोलती रहती दर्शन देने के लिए, तुम्हे आज दर्शन दे दिया.  मुखिया की कोई गलती नहीं थी, वह तो मेरा खेल था सिर्फ़ तुम्हारे लिए. मैंने थोड़ी सी मस्ती करी. तुम्हे आनंद आया की नहीं? चलो यह मेरा खेल मेरी वेबसाइट पर लिख देना.कोई पूछे की तुम यह कैसे लिख सकती हो, तो बोल देना की श्रीजी का हुकुम है”.

Shreeji spoke: “I will come with you’ll. I had a lot of fun today, I fooled the Mukhiya, ha,ha, ha. Nothing was pricking me. I only wanted to show you My Play. You always keep asking for darshans, I showed you my Play today. It was my Leela only for you today, the Mukhiya did not commit any mistake. I just did some maasti. Did you enjoy in this?Ok, write about My Play on ‘MY’ website. If anyone asks why you have written, say that it is Shreeji’s hukum”.

श्रीजी आगे कहते हैं, “यह तुम्हारा प्रसाद आज के लिए. अब ‘टिक टिक’ मत करना. बहुत दिमाग खाती रहती है की दर्शन कराओ, मेरा भी और इसका(गुरुश्री)भी ”.

Shreeji continues talking, “This is your Prasad for today, hence forth stop all your tik, tik (pestering), you keep eating My head and his (Gurushree’s), for My Darshans”.

पूरे दिन यह अधभूत लीला मेरे विचार में घूम रही है. मेरे सोच में आ रहा है, की ऐसा मैं ने क्या कर्म किया इस ठाकुरजी के साक्षात्कार पाने के लिए. श्रीजी ने शायद यह विचार को समझ लिया.

Later in the day all this happening was very strong in my mind. I wondered what had I done to deserve this Sakshatkar Darshan? Shreeji must have realized this thought in my mind.

कुछ समय बाद श्रीनाथजी ने मुझे समझाया, “सुधीर ने आज सुबह मुझ से विनती करी थी, ‘श्रीजी इसको (आभा) कुछ दर्शन देने की कृपा करें,  इसका बहुत मन बहुत शुद्ध है और यह आप पर पूर्ण भाव और श्रद्धा रखती है’.तो देखो, मैंने तुम्हें कितने अच्छे दर्शन दिए” .

ShreeNathji later explained to me, “Sudhir had requested me today morning, ‘Shreeji, please grant her (Abha) Your Darshans; she is fully surrendered to You and keeps complete bhav and shraddha on You’So see I gave such Live Darshans to you. Ha Ha Ha..”

मैंने श्रीजी से पूछा, “श्रीजी, मुखियाजी को कैसे पता चलता है की आप कुछ शृंगार स्वीकार नहीं करेंगे”?

I ask Shreeji, “Shreeji, how does the Mukhiyaji come to know that You will not accept”?

श्रीजी जवाब देते हैं, “मैं उस चीज को मुझे छूने नहीं देता हूँ. वह मुझसे दूर होती रहती है”.

Shreeji replies, “I do not let the object touch Me, it keeps jumping away from Me”.

जिसका मतलब हुआ की श्रीजी उस शृंगार को अपने पास नहीं आने देते, जो उन्हें उस समय स्वीकार नहीं करना होता है. वह उनकी शक्तिशाली प्रकाश से दूर रहता है.

Which would mean that He keeps blowing it away from Him, so the Mukhiyaji is not able to get it close to Him, it gets ejected from Him)

और ज़्यादा क्या  लिखूँ या समझाने की कोशिश कर सकती हूँ?

आलोकिक लीला और दिव्य खेल दर्शन सिर्फ़ शुद्ध भाव और श्रद्धा में समझे जा सकते हैं. 

यह श्रीनाथजी की हवेली है. यहाँ श्रीनाथजी का दिव्य स्वरूप विराजमान है. श्रीजी यहाँ व्रज से उठ कर पधारे थे. इस मंदिर, हवेली में कुछ सेवक  ऐसे भी हैं जिन्हें श्रीनाथजी का दिव्य अनुभव होता है.

What do I write or say or explain further? Certain spiritual happenings are beyond logic and can be understood only in faith.

It is ShreeNathji’s mandir, where we all believe Shreeji Lives in a very Live manner. Many sewaks have had an anubhuti of His Presence in the mandir.

मेरे श्रीजी, बहुत कृपा आपकी,

My Dear Shreeji, Thank You for all the kripa and love on this bhakt.

आपकी जय हो 

Jai Shreeji!

यह एक दिव्य लीला है, ठाकुरजी की. मैंने पूरी कोशिश करी है इसे उसी सादगी से आपके सामने रखने की, जितनी सादगी से प्रभु खेल कर देते हैं अपने भक्तों के साथ.

सिर्फ़ और सिर्फ़ श्रीनाथजी के हुकुम से और मेरे गुरुश्री के आशीर्वाद से आपके आनंद के लिए; 

आभा शाहरा श्यामॉ

 

 

 

 

 

 

Our first visit to Ghasiyar-ShreeNathji comes with us to visit His old Home.

ShreeNathji – His “LIVE” interactions varta in today’s time period.

Our first visit to Ghasiyar-ShreeNathji comes with us to visit His old Home.

श्रीनाथजी तुरंत मुझे जवाब देते हैं, “मुझे अच्छी तरह याद है, घसियार हवेली मेरा पुराना घर है. मैं वहां कभी कभी जाता हूँ. आज मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा”.

5th June 2007

When doing some research on ShreeNathji details for His website, (www.shreenathjibhakti.org); I came across this place called Ghasiyar. This is the Haveli that Shreeji had stayed for nearly ten years.

It looked very interesting and to know further details and get some photos for the website a visit was essential. I explained to Sudhir bhai about this divine place, and that this had been Shreeji’s home for ten long years. Sudhir bhai agreed to visit, so today we would do our Guwal and Rajbhog darshans here at Ghasiyar.

I am super excited to visit this place, as it sounds so pure and sacred. So today early morning when waiting with Gurushree for Mangla darshans to open, at around 4am, I tried talking to  Shreeji, informing Him about our visit to His old Haveli at Ghasiyar later that day.

मुझे घसियार दर्शन करने की बहुत ही कतूहलता हो रही थी; उसके बारे में पढ़ने के बाद लगता था की बहुत ही पवित्र और शुद्ध जगह है. इसलिए आज प्रातकाल 4 बजे, जब गुरुश्री के साथ मंगला दर्शन के लिए हवेली के बाहर खड़ी थी, मैंने श्रीजी से वार्तालाप करने की कोशिश करी; उन्हें बताने के लिए की हम आज उनकी पुरानी हवेली पर जा रहे हैं, जो घसियार में है.

To my amazement, ShreeNathji replied immediately, “I remember it very well. Ghasiyar Haveli is my old home. I visit there sometimes. I will also come with you’ll”.

श्रीनाथजी तुरंत मुझे जवाब देते हैं, “मुझे अच्छी तरह याद है, घसियार हवेली मेरा पुराना घर है. मैं वहां कभी कभी जाता हूँ. आज मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा”.

It felt to me as if I was a part of Him and going to visit His old Home was as nostalgic for me, and felt as if I belonged here.

मुझे इस समय यह महसूस होने लगा की मैं श्रीनाथजी का ही कुछ हिस्सा हूँ, और उनके पुराने घर पर जाना मेरे लिए उनके जितना ही रोमांचक हो रहा था; ऐसे प्रतीत हो रहा था की मैं भी यहीं की हूँ.

So around 9-9.30 am, after completing the Shringar darshans at Nathdwara Haveli we left for Ghasiyar .

Once there at Ghasiyar later in the day, Shreeji was very happy. I could again feel His Vibrational Presence, talking to me from inside; telling me how happy He is to be here and how He moves around the entire area enjoying Himself tremendously. He told me He would also be Present inside the Nij Mandir today when both the darshans opened.

Again I felt Shreeji’s Presence around us complaining like a small child, “It is very hot here, but I am very happy that you both remember this place, anyone hardly visits this place.

श्रीजी की मौजूदगी का फिर एहसास होता है. उनकी मोहक आवाज़ में वोह शिकायत करते हैं, “यहाँ तो बहुत गर्मी है, लेकिन कोई बात नहीं. मैं खुश हूँ की तुम लोग ने याद करा. यहाँ और कोई आता ही नहीं है”.

We received Prasad of ‘Khopra pak’ today; which was extremely sweet and tasty. I tried telling Shreeji in my mind how extra sweet and tasty the Prasad was. “Of course, it will be”, Shreeji again said, “I like eating extra sweet offerings”.

हमें प्रसाद में आज खोपरा पाक मिला जो की बहुत ही जियादा मीठा था. मन में मैंने श्रीजी को यह बताने  की कोशिश करी, की यह खोपरा पाक कितना मीठा और स्वादिष्ट है. “अरे वोह तो होगा ही ना, मुझे अधिक मीठा प्रसाद पसंद है”, श्रीजी जवाब देते हैं.

Later I mentioned to Sudhir bhai about this anubhuti. At that moment he silenced me, saying “Yes, I know; you are very lucky. Hardly anyone would be able to experience all the Divine closeness with Shreeji”.

Gurushree Sudhir bhai and I came here at Ghasiyar to study the details. We took pictures from outside, as similar to the Nathdwara Haveli no photography is allowed in the mandir premises. We stayed on for nearly 3-4 hours, enjoying the serenity and sacredness of the whole area. We managed to do darshans of Gwal and Rajbhog.

My Dear ShreeNathji Baba ki Jai Ho!

Ghasiyar photos from our visits there:

00

0

1

4

5

6

7

8

9

10

????????????

DSC02466

DSC02482

IMG_2990

ShreeNathji

Details about Ghasiyar:

As ShreeNathji travelled to Mevar, His Rath got stuck at one spot. When asked why, Shreeji replied, “My bhakt Ajaba Kunwari lived here; so My mandir should be built here, I will live here for a long time; this place reminds Me of Braj, I like the mountains here”. “There is also the Banas River which represents Yamunaji”. “This is Ajaba Kunwari’s land”, Shreeji said; “I will stay here. Tell all the Gusain Balak to build their baithak here also”.
Shri Govindaji began preparations to get the mandir ready. He ordered Gopaldas Usta, to hire maximum people and make sure that ShreeNathji mandir is ready in the earliest possible time. Work began day and night with hundreds of workers, and in a few months Shreeji’s mandir was ready.

In Vikram Samvat 1672 in Falgun Vad Satam, (AD-1728) Shri Damodar Maharajji (ShriDauji) established ShreeNathji’s Paat in the mandir Haveli. It was all perfectly done with Vastu pratishta and pujan, according to Vedic rites. Slowly all the various rituals and festivals were started again here similar to the Govardhan hill. Since then Shreeji happily began living here at Mewar.
A Gaushala was also built close by for all of Shreeji’s cows.
Shri Dauji Maharaj with a lot of loving care took care of Shreeji, and celebrated all utsav and the Mahautsav; all Shringar was also done by him.

But soon there was a problem created by the Scindia army. They wanted 3 lakh mudras or else threatened to loot the Haveli. As soon as the Maharana of Udaipur heard this he immediately made arrangements to move Shreeji to Udaipur for safety. Shreeji stayed in the Udaipur Haveli for nearly 10 months till His new Haveli was built at a place called Ghasiyar. This scenic place is situated in the Gokunda Mountains.
As Shreeji should not feel upset with the whole arrangement an exact replica of His Haveli in Nathdwara was erected. His Paat Utsav was celebrated here. Sewa similar to the Haveli at Nathdwara was also established soon.

There is a very interesting story behind the reason for moving out from Ghasiyar and back to Nathdwara.
Shri Gusainji-son of Mahaprabhuji had 7 sons. One of them, Shri Girdhariji came here with ShreeNathji for continuation of sewa. He was in charge of looking after the needs of Shreeji.

Once the Ghasiyar Haveli was built, all the followers and sewaks who had accompanied Him from Giriraj, (the original Appearance place of Shreeji) settled with Shreeji here at Ghasiyar for His sewa. Soon Shri Girdhariji began to face problems. He found that all children born here did not survive. It was discovered that the environment and water here was bad, and would not let any further generations of Mahaprabhuji survive. In great distress Shri Girdhariji went and bowed before Shreeji, telling Him of this misfortune; “There will be no one left to do Your sewa, we have to move back from here”. As Shri Girdhariji bowed down, Shreeji spread His feet side ways, outwardly, putting His right hand on his head as blessings and approval. (These are the darshans maintained here in the form of a pichwai showing Shreeji’s lotus feet turned sideways).
With Shreeji’s approval and blessings, they all moved back.
After Shreeji shifted back from here, His Haveli has been left intact, with the sewa continuing in a similar manner. No village has been built around here. The management is with the Nathdwara board. The place is nearly always empty. Three people manage it on a regular basis: the main mukhiyaji-Abgirdhar, munim and a watchman. As we spoke to the mukhiyaji he told us that about 15-20 bhakts came in for darshans daily; as people are not aware that such a place exists.

Though there is a Gaushala very few cows stay on a regular basis. During Annakut about 500 cows come here from Nathdwara which then return. Also when there is shortage of green grass around the Nathdwara Gaushala, some cows are temporarily shifted here.

ShreeNathji Sakshat darshans website

Our new website that has been launched is about Giriraj Govardhan and ShreeNathji.

As per ShreeNathji’s Hukum, we have been able to make public His Shakshatkar Darshans by sharing this divine Sakshatkar photo of His leela, which took place on His Sacred Mukharwind at Shri Govardhan in 2005.

Shreeji, in His love for His bhakts world wide, has now desired to reward His bhakts with HIS LALAN SWAROOP DARSHANS. 
The photographs of the Divya Darshans from Shreeji Mukharwind at Jatipura, which we were given in 2005 is now being made public, as per His desire.
The photos are totally authentic as taken at the time of pujan and not tampered with in any way. 

Once you read the Varta and see the photos, you will believe that our beloved Thakurjee, SHREENATHJI, SHREE GOVARDHANNATHJI, yet does His Divine Leela and Play in the outer world.

PLEASE DO A BIG FAVOUR FOR YOURSELF AND LOG ON TO THE WEBSITE.
RECEIVE SHREEJI’S BLESSINGS FOR YOURSELF AND YOUR FAMILY ON THIS AUSPICIOUS DAY AND EVERY DAY HENCEFORTH.

Do share this link on all your pages so that Thakurjee’s blessings spread all over the world.
Help in ShreeNathji’s sewa by spreading His Darshans. Become a link for Shreeji and His bhakts

www.govardhan.org.in

Wish you all a very happy and blessed new year
Abha Shahra Shyama

Shreeji ki Jai Ho!
Thank You for all Your Kripa on Your bhakts

10435720_965133960168597_5608879054720290633_n