A ‘selfie’ with Giriraj Govardhan

There is no other as ALIVE SPOT in Vraj Mandal as the divy 21 kms of Giriraj Govardhan parikrama marg; in our times.

It is a sthal of several sakshatkar and Shree Thakurjee anubhuti.

At any point on this parikrama marg, there are many Shilas (Girirajji stones are called Shila as they are divine) which have a divine feel about them. Shilas can appear and disappear as they are alive with the divine powers.

When there is the pavitrata and samarpan one can ‘feel’ the divine presence at several spots around this Divine Parvat, which has been the leela sthali for several Shree RadheKrishn and ShreeNathji divine leelas.

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

श्री गिरिराज गोवर्धन

श्रीनाथजी ठाकुरजी

एक selfie गिरिराज जी की दिव्य शिला के संग

इस आलोकित क्षण में हम क्या पा जाते हैं, वही समझ सकता है जो पूर्ण समर्पण में है।

गिरिराज जी के परिक्रमा मार्ग में, जहाँ से हटने को मन नहीं करे, समझ लो कुछ तो दिव्य दर्शन की अनुभूति हो रही है

An original Varta about ShreeNathji Prabhu – ‘Toad ka ghana’ (forest)

टोड के घने-श्रीनाथजी वार्ता
An original varta about ShreeNathji Prabhu – Toad ka ghana (forest)

संवत १५५२ श्रावण सुद तेरस बुधवार के दिन श्रीनाथजी टोड के घने पधारे थे:

कुंभनदासजी श्रीनाथजी की सेवा में नित्य कीर्तन करके श्रीनाथजी को रिझाते थे।श्रीनाथजी उनको अपना सानुभव जताते थे। वे साथ साथ खेलते रहते थे और बाते भी किया करते थे.
वार्ता :
थोड़े ही दिनोंमें एक यवन(Mughal kings)का उपद्रव इस विस्तारमें शुरू हुआ। वह सभी गांवोंको लूटमार करके पश्चिमसे आया। उसका पड़ाव श्री गिरिराजजीसे लगभग सात किलोमीटर दूर पड़ा था।
सदु पांडे, माणिकचंद पांडे, रामदासजी और कुंभनदासजी चारों ने विचार किया की यह यवन बहुत दुष्ट है और भगवद धर्म का द्वेषी है। अब हमें क्या करना चाहिये ?
यह चारों वैष्णव श्रीनाथजीके अंतरंग थे।
उनके साथ श्रीनाथजी बाते किया करते थे। उन्होंने मंदिरमें जाकर श्रीनाथजी को पूछा कि महाराज अब हम क्या करें ? धर्म का द्वेषी यवन लूटता चला आ रहा है। अब आप जो आज्ञा करें हम वैसा करेंगें।

श्रीनाथजीने आज्ञा करी कि हमें टोंड के घने में पधारने की इच्छा है वहां हमें ले चलो। तब उन्होंने पूछा कि महाराज इस समय कौन सी सवारी पर चले? तब श्रीनाथजी ने आज्ञा करी, “सदु पांडे के घर जो पाडा है उसे ले आओ। मैं उसके ऊपर चढ़कर चलुंगा”।
सदु पाण्डे उस पाड़ा को लेकर आये. श्रीनाथजी उस पाड़ा पर चढ़कर पधारें। श्रीनाथजी को एक तरफ से रामदासजी थांभ कर चल रहे थे और दूसरी तरफ सदु पांडे थांभ कर चल रहे थे.
कुंभनदास और माणिकचंद वे दोऊ आगे चलकर मार्ग बताते रहते थे।

टोंड के घने में एक चौतरा है और छोटा सा तालाब भी है। एक वर्तुलाकार चौक के पास आके रामदासजी और कुंभनदासजी ने श्रीनाथजी को पूछा, “आप कहाँ बिराजेंगे”?
तब श्रीनाथजीने आज्ञा करी कि हम चौतरे पर बिराजेंगे। श्रीनाथजी को पाड़े पर बिठाते समय जो गादी बिछायी थी उसी गादी को इस चौतरे पर बिछा दी गई और श्रीनाथजी को उस पर पधराये.

चतुरा नागा नाम के एक विरक्त भगवद भक्त थे वे टोड के घने में तपस्या किया करता थे। वे गिरिराजजी पर कभी अपना पैर तक नहीं रखते थे।
मानों उस चतुरा नागा को ही दर्शन देनेके लिए ही श्रीनाथजी पाडा पर चढ़कर टोंड की इस झाड़ी में पधारें,
चतुरा नागा ने श्रीनाथजी के दर्शन करके बड़ा उत्सव मनाया। बन मे से किंकोडा चुटकर इसकी सब्जी और आटे का हलवा (सीरा) बनाकर श्रीनाथजी को भोग समर्पित किया।

दूसरी वार्ता:
इसके बारे में दूसरा उल्लेख यह भी है कि श्रीनाथजी ने रामदासजीको आज्ञा करी कि तुम भोग धरकर दूर खड़े रहो।
तब श्री रामदासजी और कुंभनदासजी सोचने लगे कि किसी व्रज भक्त तके मनोरथ पूर्ण करने हेतु यह लीला हो रही है।
रामदासजी ने थोड़ी सामग्री का भोग लगाया तब श्रीनाथजी ने कहा कि सभी सामग्री धर दो।
श्री रामदासजी दो सेर आटा का सीरा बनाकर लाये थे उन्होंने भोग धर दिया।
रामदासजी ने जताया कि अब हम इधर ठहरेंगें तो क्या करेंगें ? तो श्रीनाथजी ने कहा कि तुमको यहाँ रहना नहीं है।
कुम्भनदास, सदु पांडे, माणिक पांडे और रामदासजी ये चारों जन झाड़ी की ओट के पास बैठे।
तब निकुंजके भीतर श्री स्वामिनीजीने अपने हाथोंसे मनोरथ की सामग्री बनाकर श्रीनाथजी के पास पधारे और भोग धरे।
श्रीनाथजी ने अपने मुख से कुंभनदासको आज्ञा करी,“कुंभनदास इस समय ऐसा कोई कीर्तन गा तो मेरा मन प्रसन्न होने पावे। मै सामग्री आरोंगु और तु कीर्तन गा”।
श्री कुम्भनदासने अपने मनमें सोचा कि प्रभुको कोई हास्य प्रसंग सुननेकी इच्छा है ऐसा लगता है।
कुंभनदास आदि चारों वैष्णव भूखे भी थे और कांटें भी बहुत लगे थे इस लिये कुंभनदासने यह पद गाया :
राग : सारंग
“भावत है तोहि टॉडको घनो ।
कांटा लगे गोखरू टूटे फाट्यो है सब तन्यो ।।१।।
सिंह कहां लोकड़ा को डर यह कहा बानक बन्यो ।
‘कुम्भनदास’ तुम गोवर्धनधर वह कौन रांड ढेडनीको जन्यो ।।२।।

यह पद सुनकर श्रीनाथजी एवं श्री स्वामिनीजी अति प्रसन्न हुए। सभी वैष्णव भी प्रसन्न हुए।

बादमें मालाके समय कुंभनदासजीने यह पद गाया :
बोलत श्याम मनोहर बैठे…
राग : मालकौंश
बोलत श्याम मनोहर बैठे, कमलखंड और कदम्बकी छैयां
कुसुमनि द्रुम अलि पीक गूंजत, कोकिला कल गावत तहियाँ ।। 1 ।।

सूनत दूतिका के बचन माधुरी, भयो हुलास तन मन महियाँ ।
कुंभनदास ब्रज जुवति मिलन चलि, रसिक कुंवर गिरिधर पहियाँ ।। 2 ।।

यह पद सुनकर श्रीनाथजी स्वयं अति प्रसन्न हुए। बादमें श्री स्वामिनीजी ने श्रीनाथजी को पूछा, “आप यहाँ किस प्रकार से पधारें”? श्रीनाथजी ने कहा, “हम सदु पांडेके घर जो पाड़ा था उस पर चढ़कर हम पधारे हैं”।
श्रीनाथजी के इस वचन सुनकर स्वामिनीजीने उस पाड़ा की ओर दृष्टि करके कृपा करके बोलीं, “कि यह तो हमारे बाग़ की मालन है। वह हमारी अवज्ञा से पाड़ा बनी है पर आज आपकी सेवा करके उसके अपराध की निवृत्ति हो गई”।

इसी तरह नाना प्रकारे केली करके टोड के घने से श्री स्वामिनी जी बरसाना पधारें।
बादमें श्रीनाथजी ने सभी को जो झाड़ी की ओट के पास बैठे थे उनको बुलाया और सदु पांडे को आज्ञा करी कि अब जा कर देखो कि उपद्रव कम हुआ ?
सदु पांडे टोड के घनेसे बाहर आये इतने मे ही समाचार आये कि यवन की फ़ौज तो वापिस चली गई है। यह समाचार सदु पांडे ने श्रीनाथजी को सुनाया और बिनती की कि यवन की फ़ौज तो भाग गई है तब श्रीनाथजी ने कहा कि अब हमें गिरिराज पर मंदिरमें पधरायें।

इसी प्रकारे आज्ञा होते ही श्रीनाथजी को पाड़े पर बैठा के श्री गिरिराज पर्वत पर मंदिर में पधराये।
यह पाड़ा गिरिराज पर्वत से उतर कर देह छोड़कर पुन: लीलाको प्राप्त हुआ।
सभी ब्रजवासी मंदिरमें श्रीनाथजीके दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुए और बोले की धन्य है देवदमन ! जिनके प्रतापसे यह उपद्रव मिट गया।

इस तरह संवत १५५२ श्रावण सुदी तेरस को बुधवार के दिन चतुरा नागाका मनोरथ सिद्ध करके पुन: श्रीनाथजी गिरिराजजी पर पधारें।

यह पाड़ा अनंत लीला में कौन था:
यह पाड़ा दैवी जीव था। लीला में वो श्री वृषभानजी के बगीचा की मालन थी। लीला में उसका नाम वृंदा है।
नित्य फूलोंकी माला बनाकर श्री वृषभानजी के घर लाती थी।
एक दिन श्री स्वामिनीजी बगीचा में पधारें तब वृंदा के पास एक बेटी थी उसको वे खिलाती रही थी। उसने न तो उठकर स्वामिनी जी को दंडवत किये कि न तो कोई समाधान किया।
फिर भी स्वामिनीजी ने उसको कुछ नहीं कहा। उसके बाद श्री स्वामिनीजी ने आज्ञा की के तुम श्री नंदरायजी के घर जाकर श्री ठाकोरजीको संकेत करके हमारे यहां पधारने के लिए कहो; तो वृंदा ने कहा की अभी मुझे मालाजी सिद्ध करके श्री वृषभानजी को भेजनी है तो मैं नहीं जाऊँगी.
ऐसा सुनकर श्री स्वामिनीजीने कहा, “मैं जब आई तब उठकर सन्मान भी न किया और एक काम करने को कहा वो भी नहीं किया। इस प्रकार तुम यह बगीचा के लायक नहीं हो। तू यहाँ से भुतल पर पड़ और पाडा बन जा”।

इसी प्रकार का श्राप उसको दिया तब वह मालन श्री स्वामिनीजी के चरणारविन्दमें जा कर गिर पडी और बहुत स्तुति करने लगी और कहा कि आप मेरे पर कृपा करों जिससे मैं यहां फिर आ सकुं।
तब स्वामिनीजी ने कृपा करके कहा की जब तेरे पर चढ़कर श्री ठाकुरजी बन में पधारेंगें तभी तेरा अंगीकार होगा।
इसी प्रकार वह मालन सदु पांडे के घर में पाड़ा हुई और जब श्रीनाथजी उस पर बेठ कर वन में पधारे तब वो पुन: लीलाको प्राप्त हुई.

जय श्रीनाथजी ठाकुरजी 🙏
जय श्री राधे कृष्ण 🙏

Points for this varta taken from this site:

https://www.facebook.com/mohanjigokul/

यह टोंड के घनेमें श्रीनाथजी की बैठक है जहाँ सुंदर मंदिर व बैठकजी बनाई गई है।

 

 

 

 

Jai ShreeNathji

Jai Shree RadhaKrishn

#ShreeNathjiBahkti #Govardhan

 

 

 

 

 

 

Shri Vallabh Acharya 22nd Baithakji at Maan Sarovar- Vraj

 

Shri Vallabh Acharya 22nd Baithakji at Maan Sarovar, Mathura

 

Here are some pictures displayed from my visit to the 22nd Baithak of Mahaprabhuji, located at Maan Sarovar,opposite Yamunaji, Maant, Mathura, Vraj Mandal.

Baithakji Charitr: (बैठकजी चरित्र)

Shri Mahaprabhu Vallabhachayra stayed for three days at Maan Sarovar discussing the Shrimad Bhagavat.

Once, Damala awoke in the middle of the night and noticed that his guru was missing.

A few hours later, Shree Krishn appeared before Damala who exclaimed, “Today I am certainly blessed to have your supreme vision. “

Shree Krishn than told Damala, “Today, Shrew Radha has become very displeased with me.”

Later, Shree Radha came to meet Thakurjee and Their reuinon was re established.

Damala and Shri Mahaprabhuji had the sight of this divine pastime. All of this transpired while the other Vaishnavas were deep in sleep.

 

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Shri Maha Prabhuji 22 Baithakji at Maan Sarovar

Jai ShreeNathji Prabhu 🙏

Jai Shree RadheKrishn 🙏

What are Pushtimarg Baithaks?

Baithaks in Pushtimarg religion are pavitr places where Shri Vallabhachary, the founder of Pushtimarg, narrated the Pavitr Bhagvad Katha. They are total 84 in number and spread all over the country.

Mahaprabhuji had circled the whole of India three times and done sthapna of these various Baithaks.

Each Baithak has its own particular Charitr (description).

Baithaks are holy places where there is no Idol or Chitr (Picture); seva is done of Gaddi (Seating).

ShreeNathji-Kesar Snan

Kesar Snan at ShreeNathji mandir-ज्येष्ठाभिषेक (स्नान-यात्रा)

ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा

Monday, 17 June 2019

आज ज्येष्ठाभिषेक है जिसे केसर स्नान अथवा स्नान-यात्रा भी कहा जाता है.

Shreenathjibhakti.org

Kesar Snan@ShreeNathji

श्री नंदरायजी ने श्री ठाकुरजी का राज्याभिषेक कर उनको व्रज राजकुंवर से व्रजराज के पद पर आसीन किया, यह उसका उत्सव है.

आज के दिन ही ज्येष्ठाभिषेक स्नान का भाव एवं सवालक्ष आम अरोगाये जाने का भाव ये हे की यह स्नान ज्येष्ठ मास में चन्द्र राशि के ज्येष्ठा नक्षत्र में होता है और सामान्यतया ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को होता है.

इसी भाव से स्नान-अभिषेक के समय वेदमन्त्रों-पुरुषसूक्त का वाचन किया जाता है. वेदोक्त उत्सव होने के कारण सर्वप्रथम शंख से स्नान कराया जाता है.

ऐसा भी कहा जाता है कि व्रज में ज्येष्ठ मास में पूरे माह श्री यमुनाजी के पद, गुणगान, जल-विहार के मनोरथ आदि हुए. इसके उद्यापन स्वरुप आज प्रभु को सवालक्ष आम अरोगा कर पूर्णता की.

श्रीजी प्रभु वर्ष में विविध दिनों में चारों धाम के चारों स्वरूपों का आनंद प्रदान करते हैं.

आज ज्येष्ठाभिषेक स्नान में प्रभु श्रीजी दक्षिण के धाम रामेश्वरम (शिव स्वरूप) के भावरूप में वैष्णवों को दर्शन देते हैं जिसमें प्रभु के जूड़े (जटा) का दर्शन होता है

इसी प्रकार आगामी रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रभु भक्तों पर आनंद वर्षा करेंगे.

आज कैसे सेवा की जाती है :

पर्व रुपी उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

झारीजी में सभी समय यमुनाजल भरा जाता है. चारों समय (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) की आरती थाली में की जाती है.

गेंद, दिवाला, चौगान आदि सभी चांदी के आते हैं.

आज मंगला दर्शन में श्रीजी को प्रतिदिन की भांति श्वेत आड़बंद धराया जाता है.

मंगला आरती के उपरांत खुले दर्शनों में ही टेरा ले लिया जाता है और अनोसर के सभी आभरण व प्रभु का आड़बंद बड़ा (हटा) कर केशर की किनारी से सुसज्जित श्वेत धोती, गाती का पटका एवं स्वर्ण के सात आभरण धराये जाते हैं.

इस उपरांत टेरा हटा लिया जाता है और प्रभु का ज्येष्ठाभिषेक प्रारंभ हो जाता है.

सर्वप्रथम ठाकुरजी को कुंकुम से तिलक व अक्षत किया जाता है. तुलसी समर्पित की जाती है.

तिलकायत जी अथवा उपस्थित गौस्वामी बालक स्नान का संकल्प लेते हैं और रजत चौकी पर चढ़कर मंत्रोच्चार, शंखनाद, झालर, घंटा आदि की मधुर ध्वनि के मध्य पिछली रात्रि के अधिवासित केशर-बरास युक्त जल से प्रभु का अभिषेक करते हैं.

सर्वप्रथम शंख से ठाकुरजी को स्नान कराया जाता है और इस दौरान पुरुषसूक्त गाये जाते हैं. पुरुषसूक्त पाठ पूर्ण होने पर स्वर्ण कलश में जल भरकर 108 बार प्रभु को स्नान कराया जाता है. इस अवधि में ज्येष्ठाभिषेक स्नान के कीर्तन गाये जाते हैं.

स्नान का कीर्तन – (राग-बिलावल)

मंगल ज्येष्ठ जेष्ठा पून्यो करत स्नान गोवर्धनधारी l

दधि और दूब मधु ले सखीरी केसरघट जल डारत प्यारी ll 1 ll

चोवा चन्दन मृगमद सौरभ सरस सुगंध कपूरन न्यारी l

अरगजा अंग अंग प्रतिलेपन कालिंदी मध्य केलि विहारी ll 2 ll

सखियन यूथयूथ मिलि छिरकत गावत तान तरंगन भारी l

केशो किशोर सकल सुखदाता श्रीवल्लभनंदनकी बलिहारी ll 3 ll

स्नान में लगभग आधा घंटे का समय लगता है और लगभग डेढ़ से दो घंटे तक दर्शन खुले रहते हैं.

दर्शन पश्चात श्रीजी मंदिर के पातलघर की पोली पर कोठरी वाले के द्वारा वैष्णवों को स्नान का जल वितरित किया जाता है.

मंगला दर्शन उपरांत श्रीजी को श्वेत मलमल का केशर के छापा वाला पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर सफ़ेद कुल्हे के ऊपर तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धराये जाते हैं.

मंगला दर्शन के पश्चात मणिकोठा और डोल तिबारी को जल से खासा कर वहां आम के भोग रखे जाते हैं. इस कारण आज श्रृंगार व ग्वाल के दर्शन बाहर नहीं खोले जाते.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में आज श्रीजी को विशेष रूप से मेवाबाटी व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.

सखड़ी में घोला हुआ सतुवा, श्रीखण्ड भात, दहीभात, मीठी सेव, केशरयुक्त पेठा व खरबूजा की कढ़ी अरोगाये जाते हैं.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) में ही उत्सव भोग भी रखे जाते हैं जिसमें खरबूजा के बीज और चिरोंजी के लड्डू, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी, बासोंदी, जीरा मिश्रित दही, केसरी-सफेद मावे की गुंजिया, घी में तला हुआ चालनी का सूखा मेवा, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा, विविध प्रकार के फलफूल, शीतल के दो हांडा, चार थाल अंकुरी (अंकुरित मूंग) आदि अरोगाये जाते हैं.

इसके अतिरिक्त आज ठाकुरजी को अंकूरी (अंकुरित मूंग) एवं फल में आम, जामुन का भोग अरोगाने का विशेष महत्व है.

मैंने पूर्व में भी बताया था कि अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक प्रतिदिन संध्या-आरती में प्रभु को बारी-बारी से जल में भीगी (अजवायन युक्त) चने की दाल, भीगी मूँग दाल व तीसरे दिन अंकुरित मूँग (अंकूरी) अरोगाये जाते हैं.

इस श्रृंखला में आज विशेष रूप से ठाकुरजी को छुकमां मूँग (घी में पके हुए व नमक आदि मसाले से युक्त) अरोगाये जाते हैं.

(Details taken fromhttps:m.facebook.com/Shreenathjiprasad/)

राजभोग दर्शन का विस्तार

कीर्तन – (राग : सारंग)

जमुनाजल गिरिधर करत विहार ।

आसपास युवति मिल छिरकत कमलमुख चार ॥ 1 ll

काहुके कंचुकी बंद टूटे काहुके टूटे ऊर हार ।

काहुके वसन पलट मन मोहन काहु अंग न संभार ll 2 ll

काहुकी खुभी काहुकी नकवेसर काहुके बिथुरे वार ।

‘सूरदास’ प्रभु कहां लो वरनौ लीला अगम अपार ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत मलमल की पिछवाई धरायी जाती है जिसमें केशर के छापा व केशर की किनार की गयी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को श्वेत मलमल का केशर के छापा वाला पिछोड़ा धराया जाता है.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) उष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है.

हीरा एवं मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर श्वेत रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, तीन मोरपंख की चंद्रिका की जोड़ तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.

श्रीकंठ में बघ्घी धरायी जाती है व हांस, त्रवल नहीं धराये जाते. कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. तुलसी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.

श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, मोती के वेणुजी तथा दो वेत्रजी धराये जाते हैं.

पट ऊष्णकाल का व गोटी मोती की आती है.

आरसी श्रृंगार में हरे मख़मल की एवं राजभोग में सोने की डांडी की आती है.

जय श्रीनाथजी प्रभु

ठाकुरजी श्री राधा कृष्ण की जय हो

🙏

Shreenathjibhakti.org

Kesar snan at ShreeNathji mandir

Shreenathjibhakti-Kesar snan at ShreeNathji mandir

ShreeNathji mandir on Giriraj Govardhan

ShreeNathji Mandir darshan on Shri Giriraj Govardhan parvat

श्रीनाथजी प्रभु का प्राचीन मंदिर, गिरिराज गोवर्धन पर।महिमा सुनिए, दिव्य दर्शन कीजिए

 

इस दुर्लभ विडीओ में देखिए मंदिर के वे दर्शन:

⁃ उस खिड़की का दर्शन कीजिए जहाँ से श्री ठाकुरजी श्री गुसाँई जी को दर्शन देते थे, अपने मंदिर से चंद्र सरोवर पर जब श्री गुसाँई जी ने ६ महीने विप्रयोग का अनुभव करा; उनकी बैठकजी है यहाँ पर

⁃ उस खिड़की का जहाँ श्रीनाथजी मोहना भंगी को दर्शन देते थे

⁃ उस खिड़की का जहाँ से श्रीनाथजी व्रज वासी को दर्शन देते थे बिलछु कुंड पर; और बिलछु कुंड पर अपनी ही युगल स्वरूप लीला का अनुभव करते थे

⁃ शैया मंदिर में श्री महा प्रभुजी की १५वीं बैठकजी के दर्शन कीजिए

⁃ उस शैया मंदिर का दर्शन कीजिए जहाँ श्री महाप्रभुजी श्री नवनीत प्रियाजी के साथ शयन करते हैं

⁃ दर्शन कीजिए वह सुरंग का जो सीधी नाथद्वारा जाती है, जहाँ से कहते हैं श्रीनाथजी नाथद्वारा से श्री गोवर्धन आते जाते थे

🙏

जय श्रीनाथजी प्रभु

#ShreeNathjiBhakti, #Govardhan

ShreeNathji-Important dates in His Pragatya

ShreeNathji has been on Earth for a period of 606 years (Till 2015). If we add till 2019 it will be a total of 609 years.

I have tried to mark out some important dates in His Prithvi Avtaar in a chart form, as per ‘Pragatya Vaarta’.

Hope it helps to give a new perspective to His Appearance at Shri Giriraj Govardhan

26841289_2012202518795064_8212042897508641906_o

Jai ShreeNathji Prabhu!

#ShreeNathjiBhakti

http://www.shreenathjibhakti.org

ShreeNathji ‘Live Varta’-ShreeNathji kripa at Girirajji Govardhan in Adhik month

ShreeNathji ‘Live Varta’-ShreeNathji kripa at Girirajji Govardhan in Adhik month

श्रीनाथजी, “मेरी मर्ज़ी थी, मेरे चहेते सुधीर और आभा गोवर्धन आ रहे हैं, उन्हें प्रसाद देना था”

1st June 2018 @ Giriraj Govardhan

१ जून २०१८ हम श्री गोवर्धन के लिए मुंबई से निकले। क़रीब १२.३०/१ बजे दोपहर को आश्रम पर पहुँच जाते हैं।
गरमी बहुत ज़्यादा है, क़रीब ४३-४५* होगा।

आश्रम के सामने गिरिराज जी के दर्शन करते हैं, प्रणाम करते हैं।
जैसे ही हम समान वैगरह रख देते हैं, गुरुश्री की आज्ञा होती है की हमें मुखारविंद पर जाना है।
आभा, “इतनी गरमी में, ४५* हो रहा है, क्या हम शाम के वक़्त चल सकते हैं”?
गुरुश्री, “कुछ ज़रूरी काम है, श्रीनाथजी को कुछ अर्पण करना है”; और वे उनके बैगिज में से एक प्लास्टिक की डब्बी दिखाते हैं, जो मुंबई से बहुत ही संभाल कर लाए हैं।
लेकिन बहुत बार पूछने पर भी मुझे नहीं बताते हैं, क्या लाए हैं।

गुरुश्री, “ कुछ श्रीजी का काम है जो हमें जल्द से जल्द पूरा करना है।चलो मैं उनसे पूछता हूँ की क्या हम शाम के वक़्त जा सकते हैं”?
पूछने पर श्रीजी मान जाते हैं और हम ५ बजे जाने का विचार करते हैं, स्नान, भोजन करके कुछ देर आराम करते हैं।

शाम ५ बजे स्नान करने के बाद हम परिक्रमा मार्ग से मुखारविंद दर्शन के लिए चलते हैं। अधिक महीना होने से बहुत भीड़ है, इतनी गरमी के बावजूद।
बहुत ही संभाल कर रखी हुई डब्बी को मेरे हाथ में देते हुए गुरुश्री आदेश देते हैं, “सीधे श्रीजी के मुखारविंद के पास इसे भोग के लिए रखो, खोलना नहीं और किसी से कुछ बोलना नहीं। हाथ से ढक कर श्रीजी को अर्पण करो और चुपचाप से वापस ले आओ”।
बहुत ही भीड़ होने के कारण धक्का मुक्की में ५-१० मिनट लग जाते है; मैं पूर्ण भाव से यह कार्य पूरा करती हूँ, और श्रीजी के चरण के पास जो सेवक बैठते हैं उनके परात में सेवकी भी धरती हूँ।
डब्बी लेकर गुरुश्री को लौटा देती हूँ, जो दूर खड़े देख रहे थे, वे चुपचाप उसी रूमाल में ढक कर रख लेते हैं; अभी तक मुझे ज्ञान नहीं है उस डब्बी में कौन सी क़ीमती सामान रखा है। कभी पूछती भी नहीं हूँ क्योंकि श्रीनाथजी के बहुत से कार्य शांति से चुपचाप करने होते हैं।
मुझे कहाँ मालूम है इस समय, की यह श्रीनाथजी की इतनी कृपा है हम लोगों पर!

(अर्पण करके हम लौटते हैं तब के २ फ़ोटो भी रखे हैं, जो गिगिराज जी के साथ लिए हैं; समय है ६.१३ शाम को)

आश्रम पर लौटने के बाद, आख़िर कर गुरुश्री संभाल कर उस डब्बी को खोलते हैं, उस में सिल्वर फ़ोईल (silver foil) में कुछ रखा है। अभी तक मैं सोच रही हूँ की कुछ श्रीनाथजी प्रभु के पूजन की सामग्री है।

( यह लिखते हुए मैं उसी पल में कुछ देर के लिए खो गयी; कोशिश कर रही हूँ सही शब्द ढूँढ ने की जो उस पल का सही वर्णन कर सके; जब गुरुश्री ने रूमाल में से डब्बी निकाली और उसमें रखे हुए foil में बंद सामग्री को खोला। किंतु बहुत ही मुश्किल है ऐसी कृपा और ठाकुरजी के दुलार को शब्द देना; हम सिर्फ़ महसूस कर सकते हैं, आप जो भी भक्त इसे पढ़ रहे होंगे माफ़ी चाहती हूँ, पूरी तरह से लिखने के लिए शब्द नहीं मिल रहे 🙏)

वार्ता को आगे बढ़ाते हुए;
गुरुश्री foil को खोलते हैं, मेरी उत्सुकता बहुत ही ज़ोरदार है; और उस foil में से ५ बीड़ा (paan beeda triangle) निकलते हैं, जो श्रीनाथजी प्रभु को उनकी सेवा में सभी मंदिर में रखे जाते हैं।
मुझे थोड़ा आश्चर्य होता है; गुरुश्री उसमें से एक बीड़ा मुझे देते हैं और स्वयं एक लेते हैं, बाक़ी ३ रात्रि भोजन के बाद लेंगे।

अब यह बीड़ा में ऐसी कौन सी बड़ी बात है, आप सोच रहे होंगे!
यह बीड़ा क्यों आया और कहाँ से आया, आगे विस्तार से बताती हूँ।

अगर आप फ़ोटो देखेंगे तो उसमें सिर्फ़ ३ बीड़े हैं। २ हम प्रसाद के रूप में ले चुके हैं।
फिर ३ की फ़ोटो क्यों ली? सभी ५ की ही ले लेते?

हम ने श्रीजी को याद करके बीड़े का प्रसाद लिया था, तो उसी पल श्रीनाथजी पधारते हैं;
“कैसा लगा मेरा बीड़ा, तेरे लिए कांदीवली से ले कर आए हैं”।

मुझे आश्चर्य होता है, इस बीड़े में श्रीनाथजी का क्या खेल है?

आभा, “श्रीजी बहुत ही निराला स्वादिष्ट बीड़े हैं; हम अभी आपको भोग धर के ही आए हैं”
श्रीजी, “मुझे मालूम है, सुधीर ने मुझे बोला था चलने के लिए; तू जब मुखारविंद पर धर रही थी मैं तेरे साथ ही था, वापिस भी तुम दोनों के साथ आया, देख रहा था क्या करते हो”। “अब यह जो तीन बीड़े बचे हैं, उनकी फ़ोटो ले ले जल्दी से; बाक़ी के प्रसाद भोजन के बाद लेना”।

और जो फ़ोटो उस समय लेकर रखा है, ये वही फ़ोटो है।
अब यह क्या खेल है, क्यों मुंबई से ५ बीड़ा लेकर गोवर्धन पर भोग धरा, गुरुश्री क्यों इतना संभाल कर रख रहे थे?

श्रीनाथजी का खेल उन के और गुरुश्री के शब्द में

“कल, (३१.०५.३०१८) शाम को सुधीर और मैं कांदीवली गोवर्धन नाथ हवेली गए थे, मैं सुधीर को ले कर गया था, ‘चल शयन दर्शन करते हैं’; और दर्शन के बाद सुधीर को आदेश दिया वहाँ से बीड़ा माँग ले। सुबह आभा को देंगे”।

( बहुत बार होता है श्रीजी और गुरुश्री मेरे लिए बीड़ा का प्रसाद लाते है सुबह एर्पोर्ट पर; क्योंकि बीड़ा मुझे बहुत ही पसंद है; नाथद्वारा में भी बहुत बार श्रीनाथजी मुझे बीड़ा दिलवाते हैं)

किंतु उस दिन बड़े पाट पर दर्शन था तो भोग अलग होता है और बीड़ा नहीं देते हैं।
गुरुश्री, “श्रीजी आज तो प्रसाद में बीड़ा नहीं मिल सकता, कैसे देगा, फल का प्रसाद है”
श्रीनाथजी, “अरे तू जाकर माँग तो सही शायद दे दे”।
गुरुश्री, श्रीनाथजी की आज्ञा मानकर कहते हैं, “ठीक है श्रीजी आप कहते हैं तो माँग लेता हूँ”; और श्री गजेंद्र भाई, (जो वहाँ पर मैनेजर की सेवा देते हैं) से बीड़ा माँगते हैं, “हमें बीड़ा दे सकते हैं क्या आज”,
किंतु वह मना करते है, की शयन आरती हो चुकी है, आज बीड़ा का प्रसाद नहीं है, सुबह मंगला में श्रीजी को प्रसाद धरने के बाद ही मिल सकेगा।
गुरुश्री उन्हें समझाते हैं की वे कल सुबह नहीं आ सकते हैं क्योंकि ५ बजे की फ़्लाइट से गोवर्धन जा रहे हैं। लेकिन बीड़ा अभी कैसे दे सकते हैं, भोग नहीं लगा है।

तब गुरुश्री श्रीनाथजी को समझाने की कोशिश करते हैं की आज beeda मिलना मुश्किल है, किंतु ठाकुरजी कहाँ मानने वाले हैं, उनकी भी ज़िद होती है, “तू जा, जा, उसे कह की सुबह के लिए जो बना कर रखे हैं उसमें से ५ दे दे; हम गोवर्धन जा रहे हैं सुबह और वहाँ मुखारविंद पर चढ़ाने हैं श्रीजी की सेवा में, श्रीनाथजी और श्री गोवर्धन नाथजी एक ही तो हैं ”।

गुरुश्री, श्रीनाथजी की आज्ञा मानकर फिर श्री गजेंद्र भाई के पास जाते हैं और उन्हें विस्तार से बताते हैं। सुनकर गजेंद्र जी गुरुश्री से कहते हैं की वे मुखियाजी से बात करें, वो ही बता पाएँगे।
तब गुरुश्री और श्रीनाथजी मुखियाजी के पास जाते हैं, “हमें ५ बीड़े चाहिए, सुबह गोवर्धन के लिए रवाना हो रहे हैं, वहाँ मुखारविंद पर धरने हैं”।
श्रीनाथजी के समझाने अनुसार जब गुरुश्री ने मुखियाजी को बताया की वे बीड़ा श्री गोवर्धन पर ठाकुरजी को भोग धरने के लिए माँग रहे हैं, श्रीनाथजी की प्रेरणा हुई और मुखियाजी समझ गए और कहा, “ठीक बात है, श्रीनाथजी के लिए ही बना कर रखे हैं, अगर आप गोवर्धन पर भोग धरेंगे तो बहुत अच्छी बात है”।

और मुखियाजी ने बहुत ख़ुशी से ५ बीड़े गुरुश्री को दे दिए। उन्हें सुनकर ख़ुशी थी की श्री गोवर्धन पर ठाकुरजी उनके हाथ से बने बीड़े आरोगेंगे।
गुरुश्री आज्ञा अनुसार उन बीड़े को संभाल कर रख दिया, संभाल कर गोवर्धन पर लाए, और मुझे दिए मुखारविंद पर भोग धरने के लिए!
आश्रम पर, भोग धरने के बाद जब खोला तो वे बिलकुल ताज़ा थे।

श्रीनाथजी, “मेरी मर्ज़ी थी, मेरे चहेते सुधीर और आभा गोवर्धन आ रहे हैं, उन्हें प्रसाद देना था, तो मेरी आज्ञा से इसने माँग लिया; इसी को आशीर्वाद कहते हैं,
सवाल बीड़े का नहीं था, भक्त को आनंद कराना close friend को ख़ुशी देना.”

श्रीनाथजी का खेलने का भाव, गुरुश्री का सहयोग करने का भाव, (श्रीजी के कहने पर, गुरुश्री ने गुप्त रखा और अंत तक मुझे नहीं बताया की दब्बी में क्या है)

जय हो प्रभु, आपके प्यार और दुलार भक्तों के लिए बहुत बड़ा आशीर्वाद होता है!

और फिर आज्ञा देना, जाओ मेरे खेल को भक्तों के बीच उजागर कर दो, यह कृपा को कोई समझ सके तो उसका उद्धार हो जाता है!

ईश्वर किसी के माध्यम से कुछ माँग लेते हैं,
प्रेरणा देते हैं, जैसे मुखियाज़ी को दी,

गुरुश्री मुझ से कहते हैं, “तुम्हारे सर पे चार हाथ हैं, मैं तो सिर्फ़ निमित मात्र बना था”

(ShreeNathji, “It was My desire, My favourite Sudhir and Abha are coming to Govardhan, I wished to give My Prasad to them, so with my order Sudhir asked for the Beedas; this is called Blessings;
Its not just about the beedas, it is of giving Joy to My bhakt, My close and only friend”.
ShreeNathji’s desire of Play, gurushree’s bhao of participation, (with Shree’s order, Gurushree did not disclose to me what was in the silver foil kept in the plastic box)
Jai ho Prabhu, Your Love for Your bhakts is a blessing for them!
And then You give the divine order to open this divine varta for all bhakts, it is a huge blessing and kripa for those who are able to understand!
Gurushree tells me, “You have ShreeNathji’s four hands on your head, I am just a nimit for His kripa and Love”.)

कुछ भूल हो लिखने में तो क्षमा चाहती हूँ
जय श्रीनाथजी, जय श्री राधा कृष्ण

🙏 सर्व शांति, शुभ मंगल हो !

Many more vaartas on our website:shreenathjibhakti.org

 The divine Paan Beedas given to me as a prasad

#Shreenathjibhakti
http://www.shreenathjibhakti.org

Giriraj Govardhan at Vraj Mandal:

Importance of Chaturmaas:(Four Monsoon months)

Giriraj Govardhan at Vraj Mandal:
बारिश का मौसम गिरिराज जी को मन मोहक बना देता है।

Importance of Chaturmaas, in ShreeNathji Yatra from Shri Govardhan to Shri Nathdwara in 1672 AD

..The journey to Mewar, as desired by Thakurjee, began in 1669 AD, on Asadh Sud Punam on Friday, during the last 3 hours of the night. ShreeNathji with all His sevaks arrived in Sinhad (Nathdwara) in 1672 AD, on Falgun Vad Satam on Saturday.

Since He began travel from Giriraj to Nathdwara, ShreeNathji spent three Chaturmaas on the way.

The first Chaturmaas was spent at Krishnpur in Dandoti Ghat, near the Chambal river.

The second Chaturmaas was in Krishnbilaas at Kota. (He halted here for four months).

The third Chaturmaas was spent in Chapaseni at Jodhpur. He also celebrated an Annakut here. Halt here was roughly for five months.

The fourth Chaturmaas ShreeNathji was at His mandir in Mewar.

For 2 years, 4 months and 7 days that ShreeNathji travelled from Vraj to Mewar, He spent living in His Rath.

The places blessed by Him along the way were, Hindmultan, Dandotighat, Bundi, Kota, Dhundhar, Marwad, Baanswaro, Dungarpur, Shahpura.

Neel Gai on Girirajji
Monsoon magic

🙏 Jai ShreeNathji
Jai Girirajji Govardhan

Complete story is on our website: http://www.shreenathjibhakti.org

Neel Gai on Girirajji 
Monsoon magic

‘Live’ Holi varta with ShreeNathji Thakurjee

‘Live’ Holi varta with ShreeNathji
2.03.2018

अदृश्यमान होली के रंग, श्रीजी के संग

 

कुछ दिनों से हम (गुरुश्री, श्रीजी और मैं) गिरिराज जी पर हैं। होली दहन के दिन श्रीजी कुछ समय हमारे ही साथ खेल रहे थे। फिर bye bye कर के चले गए, ये कह कर की होली का दहन है, उन्हें कुछ ज़रूरी काम है।

मैं भी आज जल्दी सो गयी थी।
श्रीजी को याद करके, और गिरिराज जी को प्रणाम कर, जप करते करते आँख लग गयी।
अचानक ऐसा लगा जैसे की मैं गुलाल के ढेर में डूब रही हूँ। घबरा कर मेरे श्रीजी को ढूँढती हूँ, उन्हें आवाज़ देती हूँ. “देखो ना श्रीजी, चारों तरफ़ रंग ही रंग हो गया, गुलाल में कमर तक डूब गयी हूँ, निकलने की कोशिश करती हूँ तो और गहरी डूब जाती हूँ; अरे श्रीजी कहाँ हो, थोड़ी मदद करीए ना, इस गुलाल के ढेर से बाहर निकालो ना”।
श्रीजी की हँसती हुई गूँज सुनती है,
“अच्छा, अच्छा; मैं मदद करूँ? आभा शाहरा श्यामॉ, लो मेरा हाथ पकड़ो”
मैंने कस के हाथ पकड़ा और श्रीजी ने बाहर खींच लिया। लेकिन यह क्या! बाहर भी चारों तरफ़ गुलाल उड़ने लगा, और श्रीजी भी ग़ायब हो गए।

पुकारने पर श्रीजी की मधुर आवाज़ फिर सुनती है,
“आभा शाहरा श्यामॉ, शायद तू तो मानसिक भाव से रंग खेल रही है, यहाँ गुलाल है ही किधर, अदृश्यमान द्रश्य में खो कर स्वप्न देख रही है तू”।
“जिसके अंदर आभा फूलती(प्रकाश मान)हो, अद्रश्यमान प्रगट होती हो, तुझे होली के रंग (सप्त रंग) की कहाँ ज़रूरत है”।
“शुद्ध, सात्त्विक, प्रगटमान आभा है तू, मेरे रंगों में पूर्ण रूप से हमेशा रंगी रहती है, शुद्धि का रंग तुझ में भरा है; बाहरी रंग की ज़रूरत नहीं है तुझे।
जा अपने आनंद में रह, मेरे भाव की मस्ती के रंगों में हमेशा भरी रहेगी तू, भूल जा बाक़ी सब कैसे होली मनाते हैं।
देख चारों तरफ़ गोवर्धन पर रंग ही रंग भर दिए हैं लोगों ने, कोई बात नहीं।

तू अपनी मानसिक यात्रा में होली के रंग खेलते खेलते अब जाग जा”।

और मैं जाग गयी, देखा तो सुबह के चार बजे थे। जैसे की मेरी आदत है, मैंने जल्दी से श्रीजी के शब्द पुस्तक में लिख लिए।

बाद में गुरुश्री को यह वार्ता सुनाई। उन्हें भी बड़ा आनंद आया। उन ने श्रीजी से आज्ञा ली, फिर लेकर मुझे कहा की इसे और भक्तों के साथ share करूँ। आनंद को बाँटूँ।

इसलिए मेरे गुरुश्री और महा गुरुश्री की आज्ञा से आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर रही हूँ।

शब्द श्रीनाथजी प्रभु के ही हैं।

कुछ भूल हो गयी हो प्रस्तुत करने में तो क्षमा करें
जय हो प्रभु 🙏
(तस्वीर श्रीनाथजी मुखारविंद की है)

Holi being played at ShreeNathji Mukharwind, Jatipura – Shri Govardhan